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शब्दार्थ शैय्यान्तर त० तब वे वैश्यायन बा० वालतपस्वी गो० गोशाला मं० मखलिपुत्र का ए० यह अर्थ को
मो० नहीं आ० आदरकिया णो नहीं प. अच्छा जाना तु० शान्त सं० रहा ॥४८॥ त० तब से वह गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र वे० बैश्यायन बा० बालतपस्वी को दो० दूसरी वक्त ए० ऐसा व० बोला किं. क्या भ० तुम मु. मुनि मु. यति जा. यावत् से० शैय्यान्तर त. तब से वह वे० वैश्यायन बा. बालतपस्वी गो गोशाला में मखलिपुत्र से दो० दुसरी त० तीसरी वक्त ए. ऐसा वु० बोलाया हुवा आ० क्रोधाय पान हुवा जा. यावत् मि० देदीप्यमान हुवा आ० आतापना भू० भूमि से ५० उत्तरकर
तवस्सी गोसालस्स मंखलिपुत्तस्स एयमटुं णो आढाइ णो परिजाणइ तुसिणीए संचिट्ठइ ॥ ४८ ॥ तएणं से गोसाले मंखलिपुत्ते वेसियायणं वालतवस्सि दोच्चंपि एवं वयासी-किं भवं मुणी मुणीए जाव सेजायरए ? तएणं से वेसियायणे बाल तवस्सी गोसालेणं मंखलिपुत्तेणं दोच्चंषि तचंपि एवं वुत्तेसमाणे आसुरुत्ते जाव
मिसिमिसेमाणे आयावणभूमीओ पच्चासकइ, पञ्चोसक्कइत्ता तेयासमुग्घाएणं समो. भावार्थ औश्यांतर है ? वैशायन बाल तपस्वीने मंखली पुत्र गौशाला के उक्त वचनों का आदर किया नहीं,
अच्छे जाने नहीं और मौन रक्षा ॥ ४८ ॥ मंखली पुत्र गौशालाने पुनः दूसरी वक्त भी ऐसा ही कहा. इस तरह दो वार, तीन वार करने से वैश्यायन बाल तपस्वी आसुरक्त यावत् क्रुद्ध हुवा और आतापना भूमि से
११ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी *
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *