________________
शब्दाथ
बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमालक
भी कहना ॥॥ जी जीव भ भगवन् कि क्या व विग्रहगति स० प्राप्त • अवि. ग्रहगति स० प्राप्त गो० गौतमः सि० कदाचित् वि. विग्रहगति स० प्राप्त सि० कदाचितू अ० अविग्रहगति । स० प्राप्त ए. ऐसे जा. यावत वे बैमानिक ॥ ७॥ ने नारकी भं० भगवन किं. क्या वि० विग्रह-:
भाणियव्वं ॥ एवं णाणतं, एवं सव्येवि सोलसदंडगा भाणियव्या ॥ ६ ॥ जीवेणं भते किं विग्गहगइ समायण्णए, अबिग्गहगइ समावण्णए ? गोयमाः सियविग्गह गइ समावण्गए, सिय आविग्गहगइ समावण्णए एवं जाव वेमाणिए॥ जीवाणं भंते । किं विग्गहगइ समावण्णगा, अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! विग्गहगइ समा
घण्णगावि, अविग्गहगइ समावण्णगावि ॥ ७ ॥ नेरइयाणं भंते ! किं विग्गहगइ व चवण प्रायःगति पूर्वक होता है. इसलिये आगे गति का वर्णन कहते हैं. अहो भगवन् ! गति करते जीव क्या विग्रह गति में जाता है या अविग्रह गति से जाता है ? अमओ गौतम ! किसी समय जीव विग्रह गति से जाना है और किमी समय जीव अविग्रह गाने से जाता है. ऐमा वैमानिक तक का जानना अब बहुत जीव आश्री प्रश्न करते हैं अहो भगवन् ! बहुत जोर ग्रिह गतिवाले हैं या अविग्रह गतिवाले है ? विग्रहगतिवाले भी है और अविग्रहगतिवाले भी हैं ॥ ७ ॥ हो भगवन् ! क्या नारकी विग्रह ।
*प्रकाशा-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी जालाप्रसादी *
भावार्थ