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वत्थजंभगा लेण भगा, सयणजंभगा, पुप्फजंभगा, फलजंभगा, पुप्फफल जंभगा, विज्जाजंभगा, अवियत्तजंभगा ॥ ११ ॥ जंभगाणं भंते ! देवा कहिं वसहि उति? गोयमा ! सव्वेसु चेव दहिवेयवेसु चित्तविचित्त जंमगपव्वएसु कंचणपव्वएसुय एत्थणं जंभगा देवा वसहिं उर्वति ॥ १२ ॥ जंभगाणं भंते देवाणं केवइयं कालंट्टिई. पण्णत्ता ? गोयमा ! एगपलिओवमं ठिई पण्णत्ता ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ चउद्दसम सयस्मय अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १४ ॥ ८ ॥
अणगारेणं भंते ! भावियप्पा अप्पणो कम्मलेस्सं ण जाणइ ण पासइ तंपुण जीव एम., पुष्प मुंभक, फल Mभक, पुष्पफल जुंभक, विद्या मुंभक और अवियत्त जंभक ॥ ११ ॥ अहो भगभावाथ
वन् ! जनक देव कहां रहते हैं ? अहो गौतम ! सब वैताढ्य पर्वत पर, चित्र विचित्र नाम के यमक में पनि पर, और कंचनगिरी पर्वत पर जूंभक देव रहते हैं ॥ १२ ॥ अहा भगवन् ! जंभक देवताओं की कितनी स्थिति कही ? अहो गौतम ! एक पल्योपम की स्थिति कही. अहो भगवन् ! आप के वचन
सत्य हैं. यह चउदहवा शतक का आठवा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ १४ ॥८॥ 6 आठवे उद्देशे में देवता की सामर्थ्यता कही. देवता से भी अधिक मुख के. भोक्ता साधु है इस से
42 अनुवादक:बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी gt
* प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी *