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________________ शब्दार्थ सत्र पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र .g देव अ. अव्यावाध दे. देव गो० गौतम प० समर्थ ए. परस्पर अ० अव्यावाव दे. देव को ए०१ । परस्पर पु० परुष की अ० अक्षि पापण में दि० दिव्य दे० देव ऋद्धि दे० देव द्युति दे. देवानु भाव ब बत्तीम प्रकार की न० नर्तविधि उ० बताने को णो नहीं तक उस पु. पुरुष को किं० किंचित् आ० आवाचवा. व्यावाध उ० उत्पन्न करे छ.छेद करे सु. सूक्ष्म उ. देखाडे से. यह ते. इसलिये जा० यावत् अ० अव्यावाध ॥ ८ ॥ प० समर्थ भ० भगवन् स० शक्र दे० देवेन्द्र दे० देवराजा पु० पुरुष का पभूणं एगमेगे अव्वाबाहे देवे एगमेगस्स पुरिसस्स एगमेगंसिं अच्छिपत्तंसि दिव्वं देविढेि, दिव्वं देवजुतिं, दिव्वं देवाणुभावं, दिव्वं बत्तीसइविहं नट्टविहिं उवदंसेत्तए णो चेवणं तस्स पुरिसस्स किंचि आवाहंवा वावाहंवा उप्पाएइ छविच्छेदंवा करेइ, ___ एसुहुमं चणं उवदंसेजा ॥ से तेणटेणं जाव अब्बावाहा ॥ ८ ॥ पभूणं भगवन् ! क्या अव्याबाध देव हैं ? हां गौतम ! अव्यावाध देव है. लोकांतिक देव मध्यगत अव्याबाध देव कहे हैं. अहो भगवन् : अव्याबाध देव क्यों कहे ? अहो गौतम ! एक अव्यावाध देव एक २१ पुरुष की भ्रमर पर दीव्य देवदि, दीव्य देव युति दीव्य देवानुभाव, और दीव्य बत्तीस प्रकार के नाटकों बताने को समर्थ है परंतु उस को किंचिन्मात्र भी बाधा, विवाधा, उत्पात व चर्मच्छेद नहीं करता है. इस प्रकार मूल्म क्रिया करने में कुशल होने से अन्यावाघ देष कहाये मये हैं ॥८॥ अहो भगवन् ! शक्र देवेन्द्र ? " winnamaAmanawar चउदहा शतक का आठवा उद्देशा 49 भावाथ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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