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शब्दार्थ
ए. एम जा. यावत् वे वैमानिक ॥२॥ ने नारकी भै• भगवन ने नरकम वताक क्या दे देश में दे देश उ. नाज: जैसे उ० उपजने में तक तैसे उ० चवने में दं दंडक भाकहना ॥३॥ नारकी भ० भगवन ने: नरक में उ० चवता कि क्या दे देश मे दे देश भा० आहार करे तः
बा देसं आहारेइ, सम्वर्ण वा सव्वं आहारेइ, एवं जाव वेमाणिए ॥ २ ॥ नरइएण भंते ! नेरइएहितो उन्धहमाणे, किं देसेणं देसं उबट्टइ? जहा उववजमाणे, तहेव उ. ध्वमाणेवि दंडगो भाणियन्वो ॥ ३ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएहितो उन्बमाणे किं
देसेणं देसं आहारेइ? तहेव जाव सव्वेणं वादेसं आहारेइ, सत्वेणं वा सब्बं आहारेइ॥ दिंडक का जानना. ॥२॥ो भगवन ! नारकी में से उर्तता हवा जीव क्या अपने देश से..का उद्वर्तना करे, देशले सर्व की उतना करे, सर्व से देश की उतना करे, या सर्व सं सर्व की उतना करे? अहो गौतम ! जैसे उत्पन्न आश्रित कहा वैसे ही उर्तन आश्रित जानना, इस में सर्व से सर्व उद्धर्तता है ॥ ३ ॥ अहो भगवन : नारकी में से उर्तता हुवा जीव क्या देश से देश पुद्गलों का आहार करे ? देश से सर्व पुद्गलों का आहार करे ? सर्व से देश का आहार करे ? अथवा सर्व से सर्व का आहार करे ? अहो गौतम ! सर्वसे देश का आहार करे व सर्व से सर्व का आहार करे, शेष सब पहिले उपजने के समय आहार का कहा वैसे भी यहां कहना. जैसे नरक का उद्वर्तन व आहार का कहा वेमे ही शेष सब
भावार्थ
8 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती
पहिया शतकका मानघा उद्देशा 882