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शब्दार्थ
धारी मनि श्री अमोलक अपिजी अनुवादक-बालब्रह्म
ने नारकी भं. भगवन् ने० नरक में उ० उपजता कि० क्या दे दंश से दें. देश आ० आहारकरे। दः देश मे स. सर्व आ. आहार करे स० सर्व मे दे० देश आ० आहार करे स. सर्व से स० सर्व
आ० आहार करे गो० गौतम नो० नहीं दे देश में दे० देश आ. प्राहार करे नो नहीं दे. देश में म. सर्व आ० आहारकरे स० मर्च से दे० देश आ० आहार करेस सपने म० मई आ० आहार करे
किं देसेणं देसं आहारेइ, देसणं सवं आहारेइ, सव्वेणं देसं आहारेइ, सव्वेणं सव्वं
आहोरइ ! गोयमा ! णो देसेणं देसं आहोरइ, णो देसणं सव्वं आहारेइ, सव्वेणं आहार करे! देश से सर्वका आहार करे ! मई से देश का आहार करे ? अथवा मर्च से सर्व का आहार करे ? अहो गौतम ! जीव एक देश में देश पुदगलों का आहार नहीं करता है, जीव एक देश से सब पुद्गलों का आहार नहीं करता है, परंतु उत्पन्न होने के दूसरे समय में ही सब प्रदेश में नरक के देश पुदलों का आहार करता है, और जीव के समस्त प्रदेश में समस्त पुगलों का आहार करता है. जैसे - ऊण किया हुवा तेल की कडाइ में पुरी को डालते पहिले पास के तेल को चूम लेती है फीर थोडा बहुत
ग्रहण करती है और थोडा बहुत छोडती है. इस प्रकार उत्पन्न होने के समय में आहार के ग्रहण योग्य ल जितने पुदलों होवे उन सब को खींच लेता है फीर कितनेक पुढलो ग्रहण करता है और कितनेक छो
ना है. इस तरह दो प्रकार में नरक के जीव आहार करते हैं. जैसे नरक का कहा मे ही अन्य पत्र
*प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी घालाप्रसादजी *
भावार्थ