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शब्दार्थ के अ० अवसर में का० काय कर के जा. यावत् क कहां उ० उत्पन्न होगा गो० गोतम इ. इस 011
है जंबूद्वीप में वि. विध्यागिरि के पा० नजदीक म. महाश्रीक न. नगर में सा० शामलीवृक्ष पने १० उत होगा त, तहां अ० अर्चनीक वं. वंदनीक जा. यावत् ला० धवल कीया म० पूजावाला. भ. हो से वह भं. भगवन् त वहां से अ० अनंतर उ० चवकर से० शेष ज. जैसे सा० शालीवृक्ष का जा यावत् अं० अंत करेगा ॥ ४॥ ए. यह मं० भगवन् उ० उपर की लकडी उ० ऊष्ण से भेदाइ जा०
गोयमा ! इहेव जंबूद्दीवे विंझगिरिपायमूले महेस्सरीए णयरीए सामलिरुक्खत्ताए ॐ पञ्चायाहिति, साणं तत्थ अच्चिय वंदिय जाव लाउल्लोहियमहियावि भविस्सइ ॥ सेणं
भंते ! तओहिंतो अणंतरं उव्वट्टित्ता सेसं जहा सालिरुक्खस्स जाव अंतं काहिति
॥ ४ ॥ एसणं भंते ! उवरिलट्ठिया उण्हाभिहया कालमासे कालं किच्चा जाव भावार्थ कहां जावेगा कहां उत्पन्न होवेगा? अहो गौतम ! इस जम्बूद्वीप में विंध्यागिरि पर्वत के मूल में महा श्रीक
नगर की पास शामली वृक्षपने उत्पन्न होगा. वह वहां बंदित पूजित यावत् गोमय से लिंपकर पांडु से पोतकर पूजित होवेगा और वह वहां से नीकलकर महाविदेह क्षेत्र में सीझेगा, बुझेगा यावत् अंत करेगा
॥ अहो भगवन् ! ऊष्ण ताप से यावत् दवाग्नि से उपर की लकडी का जीव काल करके कहा।
42 अनुबांदक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
प्रसंशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादी .