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पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र
लवसत्तमादेवा ? हंता अत्थि । से केणट्रेणं भंते ! एवं वुच्चइ-लवसत्तमा देवा लवसत्तमा देवा? गोयमा! से जहा णामए केइ पुरिसे तरुणे जार णिपुणसिप्पोवगए सालीणवा, वीहीणवा, गोधूमाणवा, जवाणवा, जवजवाणवा, पिक्काणं परियाताणं हरियाण हरितकंडाणं तिक्खणं णवपज्जवएणं असियएणं पडिसाहरिया, पडिसाहरिया पडिसंखिविया, पडिसंखिविया जाव इणामेवत्तिकटु सत्तलए लुएन्जा, जइणं गोयमा ! तेसिं देवाणं एवइयं कालं आउए बहुप्पं तओणं ते देवा तेणं चेव भवग्गहणेणं सिझंति जाव अंतंकरेति ॥ से तेण?णं जाव लवसत्तमादेवा लवसत्तमादेवा ॥ ११॥ हैं. अहो भगवन् ! लव सप्तम देव किस कारन से कहाये गये हैं ? अहो गौतम ! जैसे तरुण यावत् शिल्पकला में निपुण कोई पुरुष शाली, ब्रीहि, गेंहु, जब तथा जुवार को परिपक्व व काटने योग्य देखकर अति तीक्ष्ण बनाया हुवा दात्रादि शस्त्र मुष्टि में ग्रहण कर छेदे तो उस काल को एक लव कहते हैं. और ऐसे सात वक्त काटने से सात लव होते हैं. यदि उन देवताओं का साधु की अवस्था में 80 आयुष्य अधिक होवे तो वे भी उसी साधु के भव में आयुष्य पूर्ण कर सिद्ध बुद्ध मुक्त यावत् सब दुःखों का अंत करे, अहो गौतम ! इसलिये उन को लव सप्तम देव कहे हैं ॥ ११ ॥ अहो भगवन् ! अनुत्तरी- ।
चौदहवा शतक का सातवा उद्देशा
भावार्थ