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भावार्थ
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋषिजी
भत्तपच्चक्खायएणं भंते ! अणगारे मुच्छिए अज्झोववण्णे आहार माहारेइ अहेणं वीससाए कालं करेइ तओ पच्छा अमुच्छिए अगिद्धे जाव अणज्झोववण्णे आहार माहारेंति ? हंता गोयमा ! भत्तपच्चक्खायएणं अणगारे तंचेव ॥ से केणटेणं भंते ! है। एवं वुच्चइ-भत्तपच्चक्खायएणं तंचेव गोयमा ! भत्तपच्चक्खायएणं अणगारे मुच्छिए जाव अझोववणे आहारे भवइ, अहेणं वीससाए कालं करेइ तओ पच्छा अमुच्छिए
जाव आहारे भवइ, से तेणट्रेणं जाव आहार माहारेइ ॥ १० ॥ अत्थिणं भंते ! अहो भगवन् ! भक्त प्रत्याख्यानवाला साधु तीव्र क्षुधा वेदनीय के उदय से व्रत का निर्वाह नहीं होता, देख कर उस का उपशम करने को आहार करे फीर स्वभाव से मृत्यु प्राप्त हुए पीछ उस आहार मूर्छा व गृद्धता रहित क्या वह होवे ? हां गौतम ! भक्त प्रत्याख्यान करनेवाला साधु आहारादि मूर्छित होकर स्वभाव से काल कर गये पीछे मूर्छा व गृद्धता रहित होवे. अहो भगवन् ! यह किस.. तरह है? अहो गौतम ! भक्त प्रत्याख्यानवाला साधु आहार में मूछित यावत् तन्मय होवे और कीर काल कर गये पीछे आहार में मूर्छा व गृद्धता रहित होवे. अहो गौतम ! इस कारन से ऐसा कहा कि भक्त प्रत्याख्यानवाला साधु आहार में गद्ध यावत् तन्मय बनकर काल कर गये पीछे उस में मूच्छा व दता रहित होवे ॥१०॥ अहो भगवन् ! लव सप्तम देवता क्या है ? अही गौतम : लव सप्तम्
काधक:राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ,
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