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• बीईवएज्जा अत्थेगइए णो बीईबएजा ? गोयमा ! णेरइया दुविहा पण्णत्ता, तंजहा .. · विग्गहगइ समावण्णगाय. अविग्गहगइ समावण्णगाय ॥ तत्थणं जे से विग्गहगइ
समावण्णए णेरइए सेणं अगणिकायस्स मज्झमझेणं वीईवएजा, सेणं तत्थ झियाएज्जा ? णो' इण? समटे. णो खलु तत्थ सत्थं कमइ । तत्थणं जे से .: अविरगहगइ समावण्णए, णेरइए सेणं अगणिकायस्स मझं मझेणं णो वीईवएजा.
पंचमांम विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 480
s चोदहवा शतक का पांचवा
भावार्थ
विचित्र परिणाम केलिये पांचवा उद्देशा कहते हैं. अहो भगवन् ! क्या नारकी अग्निकाय की बीच में होकर जा सकत हैं ? अहो गौतम ! कितनेक नारकी जासकते हैं और कितनेक नारकी नहीं जासकते हैं. अहो भागवन् ! किस कारन ऐसा कहा जाता है कि कितनेक नारकी अग्निकाय की बीच में होकर जासकते और कितनेक नहीं जासकते हैं ? अहो गौतम ! नारकी दो प्रकार के कहे हैं विग्रहगति वाले और अविग्रहगति वाले. उनमें जो विग्रहगति वाले हैं वे अग्निकाय की बीचमें होकर जासकते हैं।
हां अग्नि में जलते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ याग्य नहीं है क्यों की उन को शस्त्र का आक्रमण नहीं * होता है. और जो अविग्र गति वाले हैं वे नारकी अग्निकाय की बीच में होकर नहीं जा
सकते हैं. अहो गौतम : इस कारन से ऐमा कहा मया है कि कितनेक. नारकी अग्निकाया की बीच में
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