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________________ १९२० भावार्थ 4अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8 । भैते ! पडुप्पण्णं सासयं समयं एवं चेव । एवं अणागयमणंतंपि ॥२॥ एसणं भंते ! खंधे तीतमणतं एवं चेव । खंधेवि जहा पोग्गले ॥३॥ एसणं भंते ! जीवे तीतमणंतं.. सासयं समयं दुक्खी समयं अदुक्खी समयं दुक्खीवा अदुक्खीवा, पुविचणं करणेणं अणेगभावं अणेगभूतं परिणामं परिणमइ । अहे सेविय णिजिण्णे भवइ, तओ पच्छा एगभावे एगभूते सिया ? हंता गोयमा ! एसणं जीवे जाव एगभूए एक रूप क्या हो ? हां गौतम ! वैमा होवे वगैरह अतीत काल जैसे कहना. अनागत का भी वैसे ही जानना. ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! यह स्कंध अतीत काल यावत् एक रूप होवे ? अहो गौतम जैसे पुद्गल का कहा वैसे ही स्कंध का जानना. ॥३॥ अहो भगवन् ! प्रत्यक्ष जीव अतीत अनंत शाश्वत समय में एक समय दुःखी दुःख हेतु योग से एक समय सुखी सुख हेतु योग से एक समय में सुखी दुःखी दोनों के हेतु में एक परिणाम में प्रथमहीज काल स्वभाव करण करके जिस में दःखादि का पर्याय है वह अनेक भाव परिणाम को अनेक भाव पना से अनेक पना से अनेक रूप परिणाम स्वभाव को परिणमे यह अतीत काल विषय से परिणमा. अब अनेक भाव हेतु भूत वेदनीय कर्म के उपलक्षण से ज्ञानावरणीयादि कर्म भी क्षीण होवे तब फोर एक भाव सांसारिक मुख विपर्याय से स्वभाव से मुखरूप से एक रूप पने को क्या प्राप्त हुए हां गौतम ! यह जीव यावत् एकी भावपना प्राप्त हुए वहां तक कहना. ऐसे ही वर्तमान * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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