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________________ एणं भंते । देवे महवियरस देवस्स मझमझेणं वीईवएज्जा ? णो इण? सम? ॥८॥ समदिएणं भंते ! देवे समड्रियस्स देवस्स मझमझेणं वाईवएज्जा ? णोइणट्रे समटे; पमत्तं पुण वीईवएज्जा ॥ सेणं भंते ! किं सत्थेणं अक्कमित्ता पभू अणक्कमित्ता पभू ? गोयमा ! अक्कमित्ता पभू णो अणकमित्ता पभू ॥ सेणं भंते ! किं पुट्विं ' सत्थेणं अकमित्ता पच्छा वीईवएज्जा, पुल्विं वीईवएजा पच्छा सत्थेणं अक्कमेजा ? एवं ६ एएणं अभिलावेणं जहा दसमसए आइवी उद्देसए तहेव हिरवंसेसं चत्तारि दंडगा अहो भगवन् ! अल्प ऋद्धिवाला देव महद्धिक देव की मध्य में होकर जाने को क्या समर्थ है ? अहो । गौतम! यह अर्थ समर्थ नहीं है ॥८॥ अहो भगवन् ! समऋद्धिधाला देव समऋद्धिवाला देव की बीच में होकर जाने को क्या समर्थ है ? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है. परंतु प्रमाद वश यदि वा देव होवे तो जा सकता है. अहो भगवन ! क्या शस्त्र से घात करके जा सकता है या विना घात किये जा सकता है ? अहो गौतम ! शस्त्र से घात कर जा सकता है परंतु विना घात किये नहीं जा सकता है. अहो भगवन् ! क्या वह पहिले घात कर पीछे जाता है या पाहिले जाकर पीछे घात करता ॐहै ? अहो गौतम ! पहिले घाब कर पीछे जा सकता है परंतु घात किये बिना नहीं जा सकता है, इसका * विशेष वर्णन इशवे शतक के तीसरे उद्देशे में कहा है वैसे ही यहां चारों दंडक के एकेक दंडक में तीन २१॥ पंचमांग बहाव पण्णनि (भगवती) सूत्र 4800 48. चउंदहवा शतक का तीसरा भावाथ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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