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भावार्थ
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
पच्चुगच्छणया ठियस्सपज्जुवासणया गच्छंतस्स पडिसंसाहणता ? गाइण? सम8 ॥ ३ ॥ अत्थिणं भंते ! असुरकुमाराणं सक्कारेइवा सम्माणइवा जाव पडिसंसाहणया ? हंता अस्थि, जाव थणियकुमाराणं ॥ ४ ॥ पुढवीकाइयाणं जाव चरिंदियाणं, एएसि जहा रइयाणं ॥ ५॥ अस्थिणं भंत ! पचिंदिय तिरिक्ख जोणियाणं सकारइवा जाव पडिसंसाहणया ? हंता अस्थि. णो चवणं आसणाभिग्गहेइवा आसणाणुप्पदा.
णेइवा ॥ ६ ॥ मणुस्साणं जाव वैमाणियाणं जहा असुरकुमाराणं ॥ ७ ॥ अप्पदि E करना, आने पर खडे होना, हस्त जोडना, आसन का आमंत्रण करना, आसन विज्ञाना, आये हुवे की
सन्मुख जाना, बैठेहुवे की सेवा भक्ति करना, और जाते हुवे को पहुंचाने का क्या है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् वैसा नहीं कर सकते हैं ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! असुरकुपार देव को क्या परस्पर सत्कार सन्मान यावत् जाते हुवे को पहुंचाने का क्या है ? हा गौतम! वैसा है. ऐसे ही
का जानना ॥ ४ ॥ पृथ्वीकायादि पांच स्थावर और द्विइन्द्रिय, तीइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय का मारकी जैसे कहना ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! पंचेंद्रिय तिर्यंच को सत्कार सन्मान यावत् जाते को पहुंचाने का क्या है? हाँ गौतम ! वैसा है परंतु आमन की निमंत्रणा करने का व आसन गिने का तिर्यंच को नहीं होता है ॥ ६॥ मनुष्य, वाणव्यंतर, ज्योतिषी व वैमानिक का असुर कुमार जैसे कहना ॥७॥
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदव सहायजी ज्वात्मप्रसादजी.