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जाव उदएणं ॥ २ ॥ असुर कुमाराणं भंते ! कइविहे उम्मादे पण्णसे ? एवं जहेव णेरइयाणं णवरं देवेवासे महिट्ठियतराए चेव असुभे पोग्गले पक्खिवेजा, सेणं तेसिं असुभाणं पोग्गलाणं पक्खिवणयाए जक्खावेसं उम्मादं पाउणेजा, मोहणिजस्सबा सेसं तंचेव से तेणट्रेणं जाव उदएणं ॥ एवं जाव थणिय कुमाराणं, पुढवि काइयाणं, जाव मणुस्साणं एएसिं जहा णेरइयाणं ॥ वाणमंतर जोइसिय वेभाणियाणं
जहा असुरकुमाराणं ॥ ३ ॥ अत्थिणं भंते ! पजण्णे कालवासी बुट्टिकार्य पकरेति ? भावार्थ | अहो गौतम ! इन कारनों से नारकी दोनों उन्माद को प्राप्त होते हैं. ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार
को कितने उन्माद कहे हैं ? अहो गौतम ! जैसे नारकी का कहा वैसे ही असूर कुमार का जानन इस में महदिक देव अशुभ पद्दल डाले इस से अशुभ पुद्गल प्रक्षेप कराया हुवा यक्षावेश से उन्माद : दूसग मोहनीय कर्म के उदय से होता. है. ऐसे ही स्थनित कुमार तक कहना. पृथ्वीकाया यावत् मनुष्य का नारकी जैसे कहना. वाणव्यंनर ज्योतिषी व वैमानिक का असुर कुमार जैसे कहना ॥३॥ मोहउदय से देव वृष्टि भी करते हैं. अहो भगवन् ! क्या मेघ वर्षा काल में वर्षा करता है अथवा
इन्द्र वर्षा काल की तरह वृष्टि करता है ? हां गौतम ! वर्षा काल में वर्षा होती है और इन्द्र 1% भी वर्षा करता है. अहो भगवन ! जब शक्र देवेन्द्र वृष्टि करने का कामी होता है तब कैसे करता है
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8
कपाक-राजाबहादुर लाला मुखदव सहायजी ज्वालाप्रसादी.