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42 अनुवादक-वालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
तंचेव ॥ १३ ॥ से जहाणामए मुणालिया सिया, उदगंसि कार्य उम्मज्जिअ २ चिट्ठज्जा, एगमेव सेसं जहा वग्गुलीए ॥ १४ ॥ से जहा णामए वणखेडे सिया, किण्हे किण्होभासे जाव निकुरुंबभूए पासादीए दरसणिजे अभिरुवे पडिरूवे, एवा मेव अणगारे भावियप्पा वणखंडं किच्चगएणं अप्पाणणं उट्ठे वेहासं उप्पएजा, सेसं तंचेच ॥ १५ ॥ से जहा णामए पुक्खरिणी सिया चउक्कोणा समतीरा अणुपुव्वसुजाय जाव सद्दण्णइय महुरसरणादिया पासादीया ४, एवामेव अणगारेवि भावियप्पा पोक्खरिणी किच्चगएणं अप्पाणेणं उड्ढे वेहासं उप्पएज्जा ? हंता उप्पएज्जा, ॥ १६ ॥ अपने शरीर को पानी में डुबा २ कर ऊर्ध्वमुख से रहती है ऐसे ही सब वागुल जैसे कहना ॥ १४ ॥ जैसे कोई वनखण्ड होवे वह कृष्णं वर्णवाला, कृष्ण प्रभावाला, यावत् निकुरुंब भूत व देखने योग्य, दर्शनीय, अभिरूप. प्रतिरूप, एसेही भावितात्मा अनगार वनखण्ड कृत्यगत आत्मा से ऊंचा आकाश में गमन करे शेष वैसे ही ॥ १५ ॥ जैसे कोई पुष्करणी होवे उस को चार कोने व बरावर तीर होवे, अनुक्रम से अच्छी बनी हुई होवे, यावत् शुकादि पक्षियों के मधुरस्वर वाली होवे और बहुत देखने योग्य होवे वैसे कसे भावितात्मा अनगार पुष्करणी कृत्यगत आत्मा से ऊर्ध्व आकाश में उडे॥१३॥ अटो भगवन् ! भावितात्मा
* प्रकाशक-राजाबहादूर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ