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शब्दार्थ कृत्य से अ० आपको उ० ऊर्ध्व वे० आकाश को ए० ऐसे ज० ब्राह्मण व० वक्तव्यता भा० कहना जा यावत् वि० विकुर्वणा करेंगे || ३ || से० वह ज० जैसे ज० जलो सि० होत्रे उ० पानी में का० काया को वि० प्रेस्कर गढ़ जावे ए० ऐसे से० शेष ज० जैसे व० वल्गुली ॥ ४ ॥ से० वह ज० जैसे वी० बीज) [वि० बीजक स० शकुन सि० होवे दो ० दोनों पांव स० साथ उपाडते ग० जावे ए० ऐसे अ० अनगार ॥१० चिट्ठेज्जा, एवामेव अणगारेवि भावियप्पा 'वग्गुलीकिञ्चगएणं अप्पाणेणं उड्डुं वेहासं एवं जण्णोवइयत्तव्त्रया भाणियव्वा जाव विउब्विस्संतिवा ॥ ३ ॥ से जहाणामए जलोया सिया उदगंसि कायं विउब्विहिय २ गच्छेजा एवामेव, सेसं जहावग्गुलीए ॥ ४ ॥ से जहा णामए वीयं वियगसउणे सियादोवि पाए समतुरंगेमाणे समतुरंगमाणे गच्छेजा, एवामेव अणगारे सेसं तंचव 11 ५ ॥ से जहा
सूत्र
भावार्थ
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* पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
4 तेरहवा शतकका नववा उद्देशा
पक्षी अपने दोनों पांव को ऊपर व नीचे शिर करके वटादि वृक्ष का अवलम्बन कर रहती है वैसे ही | भावितात्मा अनगार बागुल की तरह रहकर ऊर्ध्व आकाश में गमन करे. ऐसे ही यज्ञोपवीत ब्राह्मण जैसे गले में जनोइ डालकर जाता है वैसे ही साधु भी विचरे || ३ || जैसे जलज द्विइन्द्रिय जीव पानी में अपने शरीर को ऊंचा नीचा करे ऐसे ही साधु भी आकाश में गमन करे || जैसे बीज बीजक पक्षी दोनों पांव {साथ उठाता हुवा चले वैसे ही साधु भी वैक्रेय कर जाने यों कहना ॥ ५ ॥ जैसे विरालक पक्षी एक
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