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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
43 अनुवादक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
बांधे उ० उपर
भाग में आ ०
छोडे से वह रहे से० वह
व० मशक को आ० भरकर उ० उपर सि० बंधन बं० बांधे म० मध्य में गं० गांठ बं० की गं० गांठ को मु० छोडे उ० उपर के दे० भाग का वा० नीकाले उ० उपला दे० } पानी གྲྭ° भरे उ० उपर का सि० बंधन बं० बांधे म० मध्य की गं० गांठ को मु० मो० गौतम आ० पानी वा० वायु की उ० उपर चि० रहे हं० हां चि० बंघइ २ त्ता, मज्झे गठिं बंधइ २ त्ता, उवरिलं गंठि मुयइ २ त्ता, उवरिल्लं देसं वामेइ २ त्ता, उवरिल्लं देस आउयायस्स पूरेइ २ त्ता, उप्पि सियं बंधइ २ ता मझिल्लं गठिं मुयइ ॥ सेणूणं गोयमा ! से आउयाए तरस वाउयायस्स उप्पि उबरिले चिट्ठ ? हंता चिइ । से तेणट्टेणं जाव जीवा कम्मसंगहिया ॥ से दुसरा बंध बांधे, मध्य में बंध बांधकर उपर का मुख खोलकर वायु नीकाल देवे और पानी भरे.
फीर उस का मुख बांधकर बीच का बंध छोड देवे तो क्या गौतम ! उस मशक में रहे हुवे नीचे के { वायु से पानी रह सकता है ? हां भगवन् ! उपर के विभाग में वायु के आधार से पानी रह सकता हैं. तव भगवन्त ने कहा कि जैसे वायु के आधार से मशक में पानी रहा वैसे ही आकाश के आधार से वायु, वायु के आधार से पानी यावत् कर्म संग्रहीत जीव है. दूसरा दृष्टान्त जैसे कोई पुरुष वायु से { पूरिन चमड़े की मशक को कहि से बांधकर पुरुष प्रमाण से अधिक अगाध पानीवाले द्रह में प्रवेश
प्रकाशक- राजावहादुर लाला सुखदेवसहाथजी ज्वालाप्रसादनी *
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