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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
48 पंचांग विवाह पृष्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
की ठि० स्थिति प० प्ररूपी तः तहां अ० अभीचि दे० देव की ए० एक प० पल्योपम की ठि स्थिति १० प्ररूपी ॥ २१ ॥ अ० अभीचि देव ता उस दे० देवलोक से आठ आयुष्य क्षय से ठि० स्थितिक्षय से अ० पीछे उ० चक्कर क० कहां ग० जावेगा कर कहां उ० उत्पन्न होगा गो० गौतम म० महाविदेह क्षेत्र में सि० सिझेगा जा० यावत् अं० अंत करेगा से० वह ए० ऐसे भं० भगवन् ॥ १३ ॥ ६ ॥ असुरकुमारावासंसि आतावासंसि असुरकुमारदेवत्ताए उबवण्णो ॥ तत्थणं अत्थेगइयाणं अमरकुमाराणं एगंपलिओवमाट्ठई पण्णत्ता, तस्सणं अभीइस्स देवस्स एवं पलिओ मंठिई पण्णत्ता॥२१॥ सेणं अभीईदेवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएण अनंतरं उवट्टित्ता कहिं गच्छिहिति कहिं उववज्जिहिति ? गोयमा ! महाविदेहे वा सिज्झिहिति जाव अंतं काहिति ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ तेरसमसयस्सय छट्टो उद्देसो सम्मन्तो ॥ १३ ॥ ६ ॥ * ॥
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कुमार के आवास में से किसी एक आवास में असुर कुमीरपने उत्पन्न हुवा. वहां कितनेक असुर कुमारकी एक पल्योपम की स्थिति कहीं. उस में अभिचि देव की एक पल्योपम की स्थिति प्ररूपी ॥ २१ ॥ अहो भगवन् ! वह अभिचि देवता आयुष्य स्थिति व भव क्षयसे कहां जायेगा कहाँ उत्पन्न होवेगा ? अहो गौतम : महाविदह क्षेत्र में सीझेगा बुझेगा यावत् अंत करेगा. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह तेरहवा {शतक का छठा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ १३ ॥ ६ ॥
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तेरहवा शतकका छठा उद्देशा