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शब्दार्थ * जय स. शब्द ५० प्रयुंजते त० तब के केशी कुमार रा० राजा जा. हुवा म० बडे जा. यावत् वि०/
विचरता है ॥१३॥त. तब से वह उ. उदायन रा० राजा के केशी राजा को आ० पूछे त० तब ते. यह के. केशीराजा को० कौटुम्बिक पु० पुरुषों को स० बोलाकर ज जैसे जै० जमाली का त० तैसे स. आभ्यंतर बाबाबत तैसे जा. यावत् नि दीक्षा अ० अभिषेक उ० तैयार करे त० तब के केशीराजा अ. अनेक ग. गण णा नायक जा. यावत् सं० घेराया हुवा उ. उदायन गरा को सी. सिंहासनपे पु. पूर्वमुख से निः बैठाकर अ० आठ स० शन सो० मौणिक ए० ऐने ज. जैसे
राया जाए, महया जाव विहरइ ॥ १३ ॥ तएणं से उदायणे राया केसिं रायाणं , आपुच्छइ ; ॥ तएणं से केसीराया कोडुंबिय पुरिसे सद्दावेइ एवं जहा जमालिस्स . तहेव सभितर बाहिरियं तहेव जाव णिक्खमणाभिसेयं उवट्ठावेति तएणं से केसी
राया अणगगणणायग जाव संपरिवुडे उदायणं रायं सीहासणवरंसि पुरच्छाभिमुहे भावार्थ
तलवर यावत् सार्थवाह का आधिपत्यपना करते हुए पालते हुए विचरो. यों कहकर जय जय शब्द बोलने लगे. फीर केशीकुमार गजा हुवे यावत् विचरने लगे ॥ १३ ॥ फीर उदायन राजाने कशी राजा को दीक्षा लेनेका पूछा. उस समयमें केशी राजाने कौटुम्बिक पुरुषोंको बोलाये और जिस प्रकार जमाली कुमार का दीक्षा उत्सव किया वैसा उत्सा करने लगे. तब केशो कुमार अनेक गणनायकों से परवरों हुवा उदा-17
42 अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी +
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेनसहायजी ज्वालाप्रसादजी.