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Kamwammam
शब्दार्थ विचारकर जे. जहां वी वीतिभय न० नगर ते तहां उ० आंकर वी वीतिभय न • नगर की मःमध्य है।
से जे. जहां स० अपना गे०. गृह जे. जहां बा. बाहिर की उ० उपस्थान शाला ते. तहाँ । उ० आकर अ० अभिषेक ह० हस्ति को ठा० स्थापकर अ० आभषेक ह० हस्ति से १० उतर
१८७४ कर जे० जहां सी. सिंहासन ते० तहां उ० आकर सी० सिंहासनपे ते पु० पूर्वाभिमुख से णि बैठकर को० कौटुम्धिक पुरुषों को स० बोलाकर एक ऐसा व० सोला खि० शीघ्र दे० देवानुप्रिय वी०वीतिभय न नगर को स० आभ्यंतर बा बाह्य जा० यावत् प० पीछीदेवे ॥ १२ ॥ त० तब से० वह उ० उदायन
पच्चोरुभइत्ता; जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छइत्ता सीहासणवरंसि । पुरच्छाभिमुहे णिसीयइ, णिसायइत्ता, कोडुंबिय पुरिसे सद्दावेइ, सद्दावेइत्ता एवं
वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! वीइभयं णयरं सभितर बाहिरियं जाव पञ्चप्पि.. ___णंति ॥ १२ ॥ तएणं से उदायणे राया दोच्चंपि कोडुक्यि पुरिसे सदावेइ, सद्दावेइत्ता ।
उपस्थान शाला में आया. वहां अभिषेक के हस्ती को खडा कर के उस पर से उदायन राजा नीचे भावार्थ
उतरा, और सिंहासन की पास जाकर उस पर पुर्वाभिमुख से बैठा. फीर कौटुम्बिक पुरुषों को
बोलाकर ऐसा बोला कि अहो देवानुप्रिय वीतिभय नगर को अंदर व बाहिर सज्ज करो यावत् मुझे *मेरी आज्ञा पीछी दो ॥ १२ ॥ धन समय में उदायन राजाने कौटुम्बिक पुरुषों को दूसरी वक्त बोलाये
१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्यालासादजी,