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शब्दार्थ ||
१ अनुवादक-बालबमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
सर्वकाल ए. ऐसे उ० उपर का ए० एकेक को सं० जोडना जो० नो हे निचे का तं० उन को 'छ.
डना ने० जानना जा० यावत् अ. अतीत अ. अनागतकाल १०पीछे स० सर्वकाल जाया अ० अननुक्रम से सा.वह रो० रोहा से वह ए. ऐसे भ. भगवन् जा. यावत् वि० विचरते हैं॥१ भर भगवान् गो० गौतम स० श्रमण जा० यावत् एक ऐसा व० बोले का कितना प्रकार की भं० भगवन्
एक्ककं संजोय, तेणं जो जो हेछिल्लो तं तं छडेतेणं नेयव्वं जाव अतीय अणागयद्धा, पच्छासबढा. जाव अणाणुपुबीए सा रोहा, सेवं भंते २ जाव विहरइ ॥ १४ ॥ ___ भंतेत्ति भगवं गोयमे समणं जाव एवं वयासी कइविहाणं भंते ! लोयट्ठिई पण्ण
त्ता ? गोयमा ! अट्ठविहा लोयट्टिई पण्णत्ता, तंजहा – आगासपइट्ठिए वाएं भी वैसे ही कहना. इस में कोई पहिले पीछे नहीं, सब अनुक्रम रहित बराबर हैं. सदा शाश्वत है.. फीर रोहक अनगार बोले की अहो भगवन् ! आपने जो कहा वह वैसे ही है यों कहकर तप संयम से आत्माको
विचरने लगे ॥१४॥ श्री गौतम स्वामीने प्रश्न किया कि अहो. भगवन ! लोक । कितने प्रकार की है ? अहो गौतम ! लोक स्थिति आठ प्रकार की है. १ आकाश प्रतिष्ठित वायु अर्थात्
आकाश के आधार से घनवात तनुज्ञात ऐसे दोनों वायु रहे हैं २ वायु के आधार से उदधि है ३ उद-3, घि प्रतिष्ठित पृथ्वी ४ पृथ्वी प्रतिष्टित बस स्थावर प्राणी ५ जीव के आधार से अजीव रह हैं ६ कर्म के आ
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प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ