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शब्दार्थ
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ag पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
आवास में २० वमति उ रहे णो नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ से• वह के० कैसे भं० भगवन् ए. ऐसा व कहा जाता है च० चमर चा आ० आवाम गो० गौतम से० अथ ज० जैसे इ० इस म २ मनुष्य लोक में उ० प्रासाद पीठ सरिखे ले गृह उ० उद्यान में ले गृह णि नगर वाहिर ले० गृह वा। वारिधारा जैने ले० गृह त० तहां ६० बहुत म मनुष्य म० मनुष्यणी आ० वेठते हैं स. सोते हैं ज०ॐ जैसे रा• रायमश्रनीय में जा० यावत् क. कल्याण फ० फल कृत्ति वि. विशेष ५० अनुभवते वि०
अटेणं भंते ! एवं बुच्चइ-चमरचंचे आवासे ? गोयमा ! से जहा णामए इहेव मणुस्सलोगसि उवगारिय लेणाइवा उज्जाणियलेणाइवा, णिजाणियलेणाइवा, वारि
धारियलेणाइवा, तत्थर्ण बहवे मणुस्साय मणुस्सीओय आसयंति सयंति जहा राय___प्पसेणइजे जाव कल्लाणफलवित्तिविसेसं पच्चणुब्भवमाणा विहरंति, अण्णत्थ पण वसहिं है. अर्थात् बार असोन्द्र वहां नहीं रहता है. अहो भगवन् ! किस कारन में ऐसा कहते हो कि चमर चंचा आवास में चरर असुरेन्द्र नहीं रहता है ? अहो गौतम ! जैन मनुष्यलोक में उपकार करनेवाले 60 विश्रांति गृह होते हैं, उद्यान में बंगले. बगीचे वगैरह होते हैं. नमर से बाहिर नीकलते धर्मशाला वगैरह। होते हैं, ज पानादि के लिये पो रहती है. वहां पर बहुत मनुष्य व मनुष्यणियों आश्रय करती हैं। शयन करती हैं. इस का विस्तार पूर्वक कथन रायपश्रेणीय सूत्र से जानना यावत् कल्याण, फलवृत्तिका
तेरहवा शतकका चाठा उद्देशा - 4
भावार्थ