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________________ भावार्थ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी जो योजन स० सहस्त्र लंबा वि चौडा दो दो जो० योजन स० लाख ५० पेंसठ स० सहस्र ०१: छ व० बत्तीस जो० योजन स० शत किं० किंचित् वि. विशेषाधिक प. परिधि ए० एक पा० कोट स. रों बाज़ स. घेराया हुदा पा० कोट दि० देव जो० योजन स० शत उ० ऊर्ध्व उ० उंचपने ए. ऐसे च. चमर चंचा रा० राज्यधानी व०वक्तव्यता भा० कहना स०सभा रहित जायावत् च० चार पा०प्रासाद पंक्ति ॥ २॥० चमर च० चमर भं० भगवन् अ. असुरन्द्र अ० असुर राजा च चमर चंचा आ० किंचि विसेसाहिए परिक्खेवेणं ॥ सेणं एमाए पागारेणं सव्वओ समंता समंपरिक्खित्तं, १ सेणं पागारे दिवटुं जोअणस्यं उड्डे उच्चत्तेणं ॥ एवं चमरचंचा रायहाणी वत्तव्वया भाणियव्वा सभाविहूणा जाव चत्तारि पासाय पंतीओ ॥ २ ॥ चमरेणं भंते ! असुरिंदे असुरराया चमरचंचे आवासे वसहिं उवेइ ? णोइण? सम? ।। सेकेणं खाइण्णं योजन से किंचित् अधिक की परिधि कही है. उस की दिशा विदिशा की चारों तरफ एक कोट है. वह कोट १५० योजनका ऊंचा कहा है.. इस प्रकार चमरचंजा राज्यधानी की वक्तव्यता कही.. इस में मुधर्मा सभा, उपपात सभा, अभिषेक सभा, अलकार सभा, और व्यवसाय सभा ये. पांच सभाओं नहीं है. यावत् चार प्रासाद पंक्ति कही है, इन प्रासाद पंक्ति में ३४१ विमान कहे हैं ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! चमर असुरेन्द्र नमरचंचा आवास में क्या वसकर रहता है ? अझे मौतम ! यह अर्थ. समर्थ नहीं .प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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