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सूत्र
भावार्थ
4 अनुवादक - बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
"गुत्तदुवारा जहा रायप्पसेणइज्जे जात्र दुवारवयाणाई पिर्हेति दुवार • तीसेय कूडागार साला बहुमज्झदेसभाए जहण्णेणं एक्कोवा, दोवा, तिष्णिवा, उक्कोसेणं पदीवसहस्तं पीवेजा, सेणूणं गोयमा ! ताओ पदीवलेस्साओ अण्णमण्ण संबद्धाओ अण्णमण्ण पुट्ठाओ जाव अण्णमण्ण घडत्ताए चिट्ठेति ! हंता चक्कियाणं गोयमा ! केइ तासु पदीव लेस्सासु आसइत्तएवा जाव तुयहित्तएवा ? भगवं णो इणट्ठे समट्ठे, अनंता पुण तत्थ जीवा ओगाढा, से तेणट्टेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ-जाब ओगाढा ॥ ३१ ॥ कहिण्णं भंते ! अनंत जीव अवगाह कर रहे हुवे हैं. अहो भगवन् ! ऐसा क्यों कहा कि धर्मास्तिकाया यावत् । { आकाशास्तिकाय में सोने को यावत् रक्षण करने को समर्थ नहीं है क्यों कि अनंत जीव वहां अवगाह कर रहे हुवे हैं? अहो गौतम! जैसे कोई एक कूटाकारशाला है, वह दोनों तरफ से लिप्त होवे, गुप्त द्वारवाली होने वगैरह रायप्रसेणी सूत्र में कहे जैसी होने. अब कोई पुरुष उस के द्वार बंध कर देवे और उस में एक, दो यों सहस्र दीपक करे. अहो गौतम ! क्या उन प्रदीप का तेज परस्पर स्पर्शे ? हां भगवन् ! उन उक्त दीपक के प्रकाशपर कोई बैठने को यावत् सोने को क्या समर्थ होवे ?" अहो भगवन्! ऐसा नहीं हो सके क्यों अनंत जीव वहां अवगाह कर रहे हुवे हैं. अहो गौतम ! इसी से ऐसा कहा गया है कि यावत् अनंत जीव अवगाह कर रहे हुवें हैं ॥ ३१ ॥ अत्र बहुसम
प्रदीप का तेज परस्पर संबद्ध होवे.
अहो गोतम्
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* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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