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पंचमात विवाह पण्णात (भगवती ) सत्र
वीसाए, उक्कोसपदे सीयालीसाए, दसपोग्गल. जहण्णपदे बावीसाए उक्कोसपदे बावण्णाए ॥ आगासंत्थिकाय. सव्वत्थ उक्कोसगं भाणियव्वं ॥ १५ ॥ संखेजाणं भंते ! पोग्गलत्थिकायप्पदेसा केवइएहिं धम्मत्थिकायप्पदेसेहिं पुच्छा ? जहण्णपदे तेणेव संखेजएणं दुगुणेणं दुरूवाहिएणं उक्कोसपदे तेणेव संखेजएणं पंचगुणेणं दुरूवा हिएणं ॥ केवइएहिं अहम्मत्थिकाएहिं ? एवं चेव । केवइएहिं आगासत्थिकाय तेणेवं संखेजएणं पंचगुणेणं दुरूवाहिएणं || केवइएहिं जीवत्थिकाय ? अणंतेहिं, केवइएहिं
पोग्गलत्थिकाय ? अणंतेहिं ॥ केवइएहिं अडासमएहिं ? सियपुढे सिय णो पुढे जाव है पांच पुद्गलास्तिकाय प्रदेश में जघन्य बारह उत्कृष्ट सत्तावीस, छ पुद्गलास्तिकाय प्रदेश में जघन्य चउदह . उत्कृष्ट वत्नीस, सात में जघन्य मोलह उत्कृष्ट सेंतीस, आठ में जघन्य अठारह उत्कृष्ट बियालीस, नव जघन्य बीस उत्कृष्ट संतालीस, दश में जघन्य बाबीम उत्कृष्ट बावन, आकाशास्तिकाय सत्र में उत्कृष्ट
॥ १८ ॥ अहो भगवन ! संख्यात पदालास्तिकाय प्रदेश कितने धर्मास्तिकाय प्रदेश से स्पर्श हुवे}A ? अहो गौतम ! जघन्य संख्यात को दुगुना करके उस में दो अधिक करे उतने प्रदेश स्पर्श हुवे हैं. उत्कृष्ट संख्यात को पांचगुने करके दो आधिक करे उतने प्रदेश स्पर्श हुये हैं. अधर्मास्तिकाया का वैसे ही जानना, आकाशास्तिकायाका उत्कृष्ट सख्यातको पांचगुने करके दो अधिक कहना.जविास्तिकायके अनंत प्रदेश
तेरहवा शतक का चौथा उद्देशा
भावार्थ
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