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4- अनुवादक बालब्रह्मचारी पुनि श्री अमोलक ऋषीनी
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उकोसपदे सत्तरसहि, एवं अहम्मत्थि कायप्पदेसेहिंवि । केवइएहिं, आगासत्थि सत्तरसहिं ॥ सेसं जहा धम्मत्थिकायस्स ॥ एवं एएणं गमएणं भाणियव्वा जाव दस, णवरं जहण्णपदे दोण्णि पक्खिवियव्वा उक्कोसेणं पंच ॥ चत्तारि पोग्गलत्थि कायप्पदेसे• जहण्णपदे दमहिं उक्कोसपदे बावीसाए ॥ पंच पोग्गलत्थिकाय. जहण्णपदे बारसहिं उक्कोसपदे सत्तावीसाए ॥ छ पोग्गल. जहण्णपदे चउद्दसहिं उकोसेणं बत्तीसाए ॥ सत्तपोग्गल. जहण्णपदे सोलसहि उक्कोसपदे सत्ततीसाए ॥
अट्ठपोग्गल० जहण्णपदे अट्ठारसहिं उक्कोसपदे बायालीसाए॥ णवपोग्गल • जहण्णपदे स्पर्श हुवे हैं. अवगाहनावाले तीन प्रदेश, तीन नीचे के अथवा उएर के प्रदेश और दो दोनों बाजु के (यों आठ प्रदेश, उत्कृष्ट पद से सत्तरह सो अवगाहे हवे तीन, उपर के तीन, नीचे के तीन, तीन पूर्व पश्चिम के एक उत्तर व एक दक्षिण के यों मत्तरह हुवे. अधर्मास्तिकाय का भी वैसे ही जानना. आकाशा स्तिकाय के मत्तर प्रदेश स्पर्श हुवे शेष मब धर्मास्तिकाया जैसे कहना. इस क्रम से पांच छ मात यावत दश तक कहना; विशेषता इतनी की जघन्य पद में पूर्वोक्त जघन्य पद से दो अधिक कहना है और उत्कृष्ट पद में पांच अधिक कहना. जैसे चार पदलास्तिकाय प्रदेश में जघन्य दश उत्कृष्ट पार
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*.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*
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भावार्थ