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जोग वइ जोग काय जोग, जेथावण्णे तहप्पारा चलसभावा सव्वेते धम्मत्थिकाए, पवत्तंति, गतिलक्खणेणं धम्मत्थिकाए ॥ अहम्मत्थिकाएणं भंते ! जीवाणं किं पवत्तइ गोयमा ! अहम्मत्थिकाएणं जीवाणं ठाणणिसीयणतुयट्टणमणरसय एगत्तीभाव करणया जेयावण्णे तहप्पगारा थिरसभावा सब्बते अहम्मत्थिकाए पवत्तंति, ठाणल
खणेणं अहम्मत्थिकाए ॥ आगासत्थिकाएणं भंते ! जीवाणं अजीवाणय किं पवत्तइ गोयमा ! आगासत्थिकाएणं जीवदव्वाणय अजीवदव्वाणय भायणभूए एगेण वि से लक्षणवाली है. अहो भगवन् ! अधर्मास्तिकाया से जीवों को क्या प्रवर्तन होता है ? अहो गौतम ! अधर्मास्तिकाया से जीवों को खडे रहना, बैठना, सोना, मन का एकत्व भाव करना और ऐसे अन्य मब स्थिर स्वभाववाले कार्य होते हैं क्यों कि अधर्मास्तिकाया का लक्षण स्थिर का है. अहो भगवन् ! आकाशास्तिकाया से जीवों को क्या प्रवर्तन होता है ? अहो गौतम ! आकाशास्तिकाय जीव द्रव्य व अजीव द्रव्य को भाजनभूत है. एक आकाशास्तिकाय प्रदेश, एक परमाणु, दो परमाण, सो परमाणु, क्रोड, सो क्रोड, क्रोड सहस्र परमाओं से भराया रहता है. जैसे एक कमरे में दीपक किया उस का प्रकाश उस कमरे में होता है, फीर दूसरा दिवा किया उस का प्रकाश भी उस में ही आता है, यों हजारों
* प्रकाशक-राजाबहादर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *