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भावार्थ
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
गौयमा ! जंबूहीये दीवे मंदरस्स पव्वयस्स बहुमझदेसभाए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उवरिम हेट्ठिलेसु खुडुगपयरे मु एत्थणं तिरिय मज्झे अटू पएसिए रुयए
पण्णत्ते, जओणं इमाओ दसदिसाओ पवहंति तंजहा पुरच्छिमा, पुरच्छिमदाहिणा,, अहो गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी के आकाशांतर का असंख्याता भाग उल्लंघ कर जावे वहां लोक का मध्य भाग लम्बाइ में कहा है. अहो भगवन् ! अधो लोक का आयाम मध्य कहां कहा है ? अहो गौतम! चौथी पंक प्रभा पृथ्वी के आकाशांतर के साधिक अर्ध भाग अबगाह कर जावे वहां अधो लोक का आयाम मध्य कहा है. क्यों कि रुचक प्रदेश से ९०० योजन नीचे ऊर्ध्व लोक रहा है. वह सात राजु कुच्छ अधिक है. उस का मध्य चौथी पांचवी पथ्वी के मध्य का आकाशांतर ऊर्ध से अधिक उल्लंघ कर जावे जब आता है. अहो भगवन् ! ऊर्ध्व लोक का आयाम मध्य कहां कहा है ? अहो गौतम ! रुचकन प्रदेश से नव सो योजन जावे तब ऊर्ध्व लोक आता है. वह मात राजु मे न्यून है, सनत्कुमार व माहेन्द्र, देव लोक की उपर रिष्ट विमान प्रस्तर में ऊर्य लोक का आयाम मध्य कहा है. अहो भगवन् ! तीर्छा लोक का मध्य भाग कहाँ कहा है! अहो गौतम! इस जम्बद्वीप के बहुत मध्य भाग में मेरु पर्वत रहा हुवा है. इस की मध्य में रत्नप्रभा पृथ्वी की ऊपर रत्न काण्ड के नीचे सब से छोटी दो प्रतर हैं. इन दोनों की मध्य में तीर्छालोक का मध्य कहा है. वहां आठ रुचक प्रदेश कहे हैं. इन से दश दिशाओं
- प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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