________________
www
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी "
तेचेव ॥ १०॥ सेणूणं भंते ! कण्हलेस्से णील जाव सुक्कलेस्से भवित्ता, कण्हलेस्सेंसु देवेसु उववजंति ? हंता गोयमा! एवं जहेव णेरइएमु पढमे उद्देसए तहेव भाणियव्वं, णीललेस्साएवि जहेव णेरइयाणं,जहा णील लेस्साए एवं जाव पम्हलेस्लेख पुक्कलेस्ससु एवं चेव, णवरं लेस्साटाणेसु विसुज्झमाणेमु विमुज्झमाणेसु मुक्कलस्सा परिणमइ, परिणमइत्ता सुक्कलेस्सेमु देवेमु उववजंति. से तेण?णं जाव उपवति ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥
तेरसम सयस्सय वितिओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ १३ ॥ २ ॥ + + कहना परंतु अनुत्तर विमान में मात्र एक समादृष्टिवाले उत्पन्न होते है, समदाष्टेवाले चवते हैं और ममदाष्टेचाले पाते हैं. ॥१०॥ अहो भगवन् ! कृष्णलेशी नीललेशी यावत् शुक्ललेशी होकर क्या पुनः कृष्ण लेश्यावाले देवपने उत्पन्न होवे ? हां गौतम! उत्पन्न होवे. इस का विशेष खुलासा पहिला नरक उद्देशा में कहा है. ऐसे ही शेष पांवों लेश्या का जारला. विशेष में इतना कि लेश्या के स्थानक में विशुद्ध होता हवा शुक्ललेश्या के परिणामपने परिणमे, शुक्ल लश्यान बनकर शुक लेयावाले देव में उत्पन्न होवे. अहो गौतम इसलिये ऐसा कहा गया है कि उत्पन्न होवे. अहो भगान् ! आप के वचन सत्य हैं. यह तेरहवा शतक का दूसरा उद्देशा पूर्ण हुवा. ॥ १३ ॥ २ ॥
प्रकाशकनाजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रमादजी *