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कइविहाणं भंते ! देवा पण्णत्ता ? गोयमा ! चउबिहा देवा पण्णत्ता, तंजहा भवण- . वासि वाणमंतर जोइसिय वैमानिया ॥ १ ॥ भवणवासीणं भंते ! देवा कइविहा पण्णत्ता ?गोयम.! दत्तविहा पण्णत्ता, तंजहा असुर कुमारा एवं भेदो जहा बितियसए देवुद्देसए जाव अपराजिया सव्वट्ठसिद्धगा ॥ २ ॥ केवइयाणं भंते ! असुर कुमारा घास सयसहस्सा पण्णत्ता ? गोयमा ! चोयट्ठि असुर कुमारावास सयसहस्सा. पण्णत्ता ॥ ते भंते ! किं संखेजवित्थडा असंखेजवित्थडा? गोयमा! संखेजवित्थडावि
असंखेजवित्थडावि ॥३॥ चोयट्टीएणं भंते! असुर कुमारावास सयसहस्सेसु संखेलभावार्थ प्रथम उद्देशे में नरकका अधिकार कहा. दुसरे उद्देशे में सामिक देव होने से देव का कथन करते हैं.
हो भगवन् ! देव के कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम ! देव के चार भेद कहे हैं भवनपति, वाणव्यंतर, ज्यातिषी और वैमानिक ॥१॥ भवनपति देव के दश भेद कहे हैं. असुरकुमार वगैरह दूसरे शतक के देव है उद्देशे में कहा वैसे ही यहांपर सर्वार्थ सिद्ध तक जानना ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! अमरकुमार के आवाम *कितने लाख कहे हैं ? अहो गोतम ! अनुरकुमार के चौसठ लाख आवास कहे हैं. अहो भगवन् ! वे
संख्यात योजन के विस्तार वाले हैं या असंख्यात. योजन के विस्तार वा दो गौतम! संख्यात
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 488o
.. तेरहया शतकका दूसरा उद्देशा
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