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18 उववजंति, सम्मामिच्छदिट्ठी णेरइया णज्वरजंति, एवं उव्वटंतिवि, अविरहिए जहेव
रयणप्पभाए ॥ एवं असंखेज वित्थडेसु तिष्णि गमा ॥१५॥ से गुणं भंते ! कण्हलेस्से नीललेस्से जाव सकलेस्से भवित्ता, कण्हलेस्से णेरइएस उववजंति ? हंता गोयमा ! कण्हलेस्से जाव उववजंति ॥ से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ कण्हलेस्से जाव उववजंति ? गोयमा! लेस्सट्टाणेसु संकिलिस्समाणेसु सीकलिस्समाणेसु कण्हलेसं परिणमइ कण्हलेस्सं परिणममाणेसु कण्हलेरसेसु णेरइएमु उववजति से तेणटेणं
जाव उववजंति ॥ सेणूणं भंते ! कण्हलेस्से जाव सुकलेस्से भवित्ता णीललेस्सेसु भावार्थ पृच्छा ? अहो गौतम ! समदृष्टि नहीं उत्पन्न होते हैं, मिथ्यादृष्टि नारकी उत्पन्न होते हैं, सममिथ्यादृष्टि
नारकी नहीं उत्पन्न होते हैं, ऐसे ही उद्वर्तन व अविरहित का जानना. संख्यात योजन के विस्तार वाले में जैसे तीन गया कहे वैसे ही असंख्यात याजन के विस्तार वाले में तीन गमा जानना. ॥ १५ ॥ अहो | भावन् ! कृ गलेशी, नीललेशी: यावत् शुक्ललेशी होकर क्या कृष्णलेशी नारकी में उत्पन्न होते हैं ? हां गौतम ! कृष्णलेशी यावत् उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से ऐसा कहते हो ? अहो गौतम! लेझ्या स्थान के भेद में निर्मलता र. मलिनता को प्राप्त होते हैं. इस तरह अशुद्ध लेश्या परिणमते. कृष्ण
विवाह पण्णचि ( भगवती ) सूत्र 48 पंचमांग
. तेरहवा शतकका पहिला उद्देशा