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28 पंचमाङ्ग बाह १ण्णत्ति (भग तो) मूत्र 38*
इंदियोवउत्ता जहा असण्णी, संखेज्जा मणजोगी, एवं जाव अणागारोवउत्ता ३९, अणंतरोववण्णगा सिय अत्थि सिय णत्थि जइ अत्थि जहा असण्णी संखेजा परंपरोववण्णगा एवं जहा अणंतरोववण्णमा तहा अणंतरोवगाढा. अणंतराहारगा, अणंतर पजत्तगा चरिमा, परंपरोवगाढा, जाव अचरिमा, जही परंपरोववण्णगा ॥ ६ ॥ इमीसेणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए तीसाए णिरयावास सयसहस्सेसु असंखेज वित्थडेसु णरएसु एगसमएणं केवइया णेरइया उववजंति, जाव केवइया अणागारोवउत्ता उववजंति ?
गोयमा ! इमीसेणं रयणप्पभाए पुढवीए तीसाए णिरयावास सयसहस्सेस असंखेज मन योगी ऐने ही अनाकारोपयोग पर्यंत जानना अनंतर उत्पन्न क्वचित् हैं काचित् नहीं हैं यदि है तो जयन्य एक दो तीन उत्कृष्ट संख्यात, संख्यात परंपरा से उत्पन्न हुवे हैं. ऐसे ही अनंतरावगाढ, अ तराहारी, अनंतर पर्याप्त, चरिम, परंपरावगाढ, यावत् अचरिम का जानना ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! इस रसप्रभा पथ्वी के तीस लाख नरकावास में से असंख्यात योजनवाले नरकावास में एक समय में कितने नारकी उत्पन्न होते हैं यावत् कितने अनाकारोपयोगराले उत्पन्न होते हैं? अहो गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावास में से असंख्यात योजन के विस्तारवाले नरकावास में एक समय में जयन्य
- तेरहवा शतक का पहिला उद्दशा HD
भावार्थ
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