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Al१८८२
भावार्थ
4.2 अनवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
.. वित्थडेसु णरएसु एगसमएणं जहण्णेणं एक्कोवा दोवा तिण्णिवा, उक्कोसेणं संखज्जा
जेरइया उव्वदृति, जहण्णेणं एक्कोचा दोवा तिण्णि वा उक्कोसेणं संखेजा काउलेस्सा उब्वटंति, एवं जाव सण्णी असण्णी ण उबट्टीत जहण्णणे एक्कोवा दोवा तिन्निवा उक्को. सेणं संखेजा भवसिद्धिया उव्वटंति एवं जाव सुअअण्णाणी विभंगणाणी ण उव्वदंति चक्खुदंसणी ण उब्वटंति, जहण्णेणं एक्कोवा दोवा तिाण्णवा उक्कोसेणं संखेजा अचक्खु दसणी उन्नति, एवं जाव लोभ कसायी, सोइंदियोवउत्ता ण उव्वटंति, एवं जाव फासिंदियोवउत्ता ण उव्वदृति, जहण्णणं एक्कोवा दोवा तिणिवा उक्कोसेणं संखेजा
णो इंदियोव उत्ता उव्वदंति, मणजोगी ण उव्वटंति, एवं वइजोगीवि, जहण्णेणं उत्कृष्ट संख्यात कापुत. लेश्या वाले उद्वर्तते हैं. ऐसे ही.संज्ञी तक कहना. असंज्ञी नहीं उत्पन्न होते हैं. जघन्य - एक दो तीन उत्कृष्ट संख्यात भवसिद्धिक उद्वर्तते हैं ऐसे ही श्रुत अज्ञानी तक जानना. विभंग ज्ञानी नहीं उद्बती हैं क्यों की उद्वर्तन काल में विभंग ज्ञान नहीं होता है. चक्षुदर्शनी नहीं उद्वर्तते है. जघन्य एक दो तीन उत्कृष्ट संख्यात अवक्षुदर्शनी उद्वर्तते हैं ऐसे ही लोभ कषायी पर्यंत जानना. श्रोत्रेन्द्रिय यावत् स्पर्शेन्द्रिय नहीं उद्वर्तते हैं. जघन्य एक दो तीन उत्कृष्ट संख्यात नोइन्द्रिय उद्वर्तते हैं.. मनयोगी और वचन
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.