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* केवइया पुरिसवेदगा उववज्जति २३, केवइया णपुंसगवेदगा उववजंति २४, केवइया
कोहकसायी उववजंति २५, जाव केवइया लोभकसायी उक्वजंति २८, केवइया सोइंदियोवउत्ता उववजंति २९, जाव केवइया फासिंदियोवउत्ता उत्रवजंति ३३,
१७९९ केवइया णोइंदियोंवउत्ता उववजंति ३४, केवइया मणजोगी उववजंति ३५, केवइया वइजोगी उववजति ३६, केवइया कायजोगी उववजंति ३७. केवइया सागारोवउत्ता उववजंति ३८, केवइया अणागारोवउत्ता उववजंति ३९ ? गोयमा ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए तीसाए रइयावास सयसहस्सेसु संखेजवित्थडेसु णरएसु
जहण्णणं एक्कोवा दोवा तिण्णिवा उक्कोसेणं संखेजा जेरइया उववजंति, जहण्णेणं
गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावास में के संख्यात योजन के नरकावाम में जघन्य एक भावार्थ 1. दो तीत उत्कृष्ट संख्यात नारकी उत्पन्न होते हैं, जघन्य एक दो तीन उत्कृष्ट संख्याते कापुत लेश्यावाले
उत्पन्न होते हैं, जवन्य एक दो तीन उत्कृष्ट संख्याते कृष्ण पक्षवाले उत्पन्न होते हैं ऐसे ही, शुक्लपक्षी, संज्ञी, असंज्ञी, भवसिद्धिक, अभवसिद्धिक, आभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, और अवधि ज्ञानीका जानना,
चक्षुदर्शनी नारकी नहीं उत्पन्न होते हैं. क्यों की उत्पन्न होते. शरीरः पूर्याय का बंध किये। 1 मिना इन्द्रिय का अभाव होता है. अचक्षुदर्शनी जघन्य एक दो तीन उत्कृष्ट संख्याते उत्पन्न ।
48 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
तेरवा शतक का पहिला उद्देशा