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________________ १७८३ पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र ८.११ णाणे? गोयमा ! आया सिय णाणे सिय अण्णाणे, णाणे पुण णियमं आया ॥ ५॥ आयाणं भंते! गैरइयाणं णाणे अण्णे णेरइयाणं णाणे ? गोयमा! आया णेरइयाणं सियणाणे सिय अण्णाणे, णाणे पुण तेणियमं आया, एवं जाव थणियकुमाराणं ॥ आया भंते! पुढवी काइयाणं अण्णाणे अण्णे पुढवी काइयाणंअण्णाणे,? गोयमा ! पुढवीकाइयाणं णियम अण्णाणे अण्णाणे णियमं आया, एवं जाव वणस्सइकाइयाणं ॥ बेइंदिया तेइंदिया जाव वेमाणियाणं जहा णेरइयाणं ॥ ६ ॥ आया भंते ! दंतणे अण्णे दसणे ? गोयमा ! वन् ! क्या आत्मा ही ज्ञान है या आत्मा से अन्य ज्ञान है ? अहो गौतम ! सम्यक्त्व होने से आत्मा क्वचित् ज्ञान है और मिथ्यात्व होने से आत्मा क्वचित् अज्ञान है. परंतु ज्ञान में आत्मा निश्चय ही हो है क्यों कि आत्मा का ज्ञान गुण रहा है ॥५॥ अहो भगवन् ! नारकी का आत्मा क्या ज्ञान है अन्य ज्ञान है ? अहो गौतम ! नारकी का आत्मा काचित् ज्ञानमय है और क्वचित् अज्ञानमय है. ज्ञान में आत्मा निश्चयही होता है. ऐसे ही असुर कुमार यावत् स्थमित कुमार पर्यंत दश भुवनपति का जानना. अहो भगवन् ! पृथ्वीकाया का क्या आत्मा अज्ञान है या अन्य अज्ञान है ? अहो गौतम ! पृठी काया में नियमा अज्ञान होता है और अज्ञान में नियमा आत्मा होता है ऐसे ही वनस्पति काया wwwmmmmmmmmmm 48800 बारहवा शतक का देशका उद्देशा भावार्थ 488
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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