________________
88
शब्दार्थ
* मणि में उ• उत्पन्न होवे ए. ऐसे जः जैसे ना नागका ॥ २ ॥ दे० देव भं० भगवन् म० महर्दिक ना० ।
यावत् वि. विशरीरी रु० वृक्ष में उ० उत्पन्न होवे ए. एसे ही ण विशेष जा. यावत् स. सन्निहित पा० प्रतिहार्य ला• सुंवाली करना लो० साफ करना म° पूजा भ० होवे से शेष तं० तैसे जा. यावत् अं० अंतकरे ॥ ३ ॥ गो. बडा वानर कुछ कुकुटवृषभ मं० मंडुकवृषभ णि निःशील नि० व्रतरहित णि.
रेसु मणीसु उववजेज्जा एवं चेव जहा नागाणं ॥ २ ॥ देवेणं भंते ! महिड्डीए जाव विसरीरेसु रुक्खसु उववजेजा ? एवं चेव, णवरं इमं णाणत्तं जाव सण्णिहिय पाडिहेरे लाउलोइय महइयावि भवेजा, सेसं तंचेव जाव अंतं करेजा ॥ ३ ॥ अह भंते !
गोणं गुलबसभे कुक्कुडबसभे मंडुक्कबसभे, एएणं णिस्सीला, णिव्वया, णिग्गुणा, गौतम ! इस का सब अधिकार नाग जैने कहना ॥ २॥ अहो भावन् ! क्या महदिक देव दो शरीरी वृक्ष में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! इम का सर अधिकार नाग जैसे कहना विशेष में उस वृक्ष के नजदिक। पूर्व संगति देवता से किया हुवा प्रतिहार्य कर्म से छाना गोबरादि से भूमिका साफ करे खडीचूनादि लगावे ! और इस से वह वृक्ष पूजनीय होरे यावत् मनुष्य बनकर सब दुःखों का अंतकरे. ॥ ३ ॥ अब नरक गामी का कथन कहते हैं. अहो भगवन् ! सब वानरों में बडा वानर, कुकुट वृषभ, मण्डूक वृषभ ये तीन ।
पंचमाङ्ग विवाह पण्पत्ति (भगवती) मूत्र
80-बारहवा शतक का आठवा उद्दशा 48
8