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अब्दार्थको फु० स्पर्शता है सा० सागर का अंत दी० द्वीप का अंत को फु० स्पर्शता है हैं. हां जा
यावत् नि निश्चय छ० छदिशा में फु० स्पर्शता है ॥ ४ ॥ ए. ऐसे ए० इस अ० अभिलाप से उ००० पानी का अंत पो• नाव का अंत को छि छेद का अंत दू० कपड़े का अंत को छा० छाया का अंत आ आतप का अंत को जा. यावत् णि निश्चय. छ० छदिशा में फु० स्पर्शता हैं ॥५॥ अ० है भं० श्गवन जी जीव पा. प्राणातिपातिकी कि० क्रिया क. करता है हर हां अ० है सा. वह भं.
48408 पंचमाङ्ग विवाह पण्यत्ति (भगवती)
रंतेवि दीवंतं फुसइ ? हंता जाव नियमा छद्दिसिं फुसइ ॥४॥ एवं एएणं अभिलावणं उदयंते पोययंत छिदंते दुससंतं छायंते आयवंतं, जाव णियमा छहिसिं फुसइ ॥५॥
आत्थिणं भंते जीवाणं पाणाइवाएणं किरिया कज्जइ ? हंता अस्थि । सा भंते ! किं द्वीप के अंत को स्पर्शता है ? हां गौतम ! द्वीप का अंत सागर के अंत को स्पर्शता है सागरका अंत दीप के अंत को स्पर्शता है यावत छ दिशि में स्पर्शकर स्पर्शता है द्वीप समुद्र एक हजार योजनके ऊंडे हैं इसी से छ दिशा ग्रहण की गइ है ॥ ४॥ ऐसे ही पानी व नाव, कपडा व उस का छिद्र, आतप व छाया का जानना उन के भी अंत परस्पर छ दिशाओं में निश्चय ही स्पर्शकर रहे हैं॥५॥50| स्पर्श के अधिकार से अठारह पाप स्थानक से उत्पन्न हुने जो कर्म उन का आधिकार कहते हैं. अहो ।
2 पहिला शतक का छट्टा उद्देशा
भावार्थ
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