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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
48 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र
अनंत गुणा व श्रेष्ठ का०कान भाग अ० असुरेन्द्र ववर्जकर मभवनवासी दे० देवका का०काम भोग से अ० असुर कुमार दे० देवका अ० अनंत गुणावि श्रेष्ठ काम भोग अ० असुर कुमार दे० देव का का० काम भोग से ग० ग्रह ० गण ण० नक्षत्र ता० तारारूप जो० ज्योतिषी का अ० अनंतगुणा वि० श्रेष्ठ का काम भोग ग० ग्रह ग० गण ण० नक्षत्र जा० यावत् का काम भोग से चं० चंद्र सू० सूर्य जो० ज्योतिषी जो० ज्योतिषी राजा का अ० अनंत गणा वि० श्रेष्ठ काम भोग चं० चंद्र सू० सूर्य गां० गौतम गहगणणक्खत्त तारारूवाणं जोइसियाणं एत्तो अनंतगुणविसिटुतराचेत्र कामभोगा गहगणणक्खत्ततारारूत्राणं जोइसियाणं कामभोगेहिंतो चंदिम सुरियाणं जोइसियागं जोइसरायाणं एतो अनंतगुण विसितराचेच कामभोगा, चंदिम सूरियाणं गोयमा ! जोइसिंदा जोइसिरायाणो एरिसए कामभोगे पचणुब्भवमाणा विहरति ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ? भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं जाव विहरइ || त्राणव्यंतर के कामभोगों अनंतगुणे विशिष्टतर होते हैं. और वाणव्यंतर के कामभोगों से असुरन्द्र छोडकर अन्य भवनवासी देवों के कामभोग श्रेष्ठ कहे हैं. असुरेन्द्र छोड़कर अन्य सब भुवनपति के कामभोगों से असुरेन्द्र के कामभोग अनंतगुने श्रेष्ठ हैं असुर कुमार के कामभोग से ग्रह, नक्षत्र नारा रूप ज्योतिपियों के कामभोग अनंतगुने श्रेष्ठ हैं और ग्रह नक्षत्र व तारा रूप ज्योतिषियों के कामभोगों से ज्योतिषीके
40 बारहवा शतक का छठा उदशा
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