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शब्दार्थ
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अनुवादक-वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
ज्योतिषीन्द्र जो० ज्योतिषी राजा ए०इस प्रकारका का काम भोग ५० अनुभवते वि विचरते हैं॥१२॥॥ *
ते उस काल ने उस समय में जा. यावत् ए. ऐसा व० बोले के० कितना म. बडा भं० भगवन् लो० लोक ५० प्ररूपा गो० गौतम म० महा म. बडा लो० लोक ५० प्ररूपा पु० पूर्व में अ० असंख्यात योजन को क्रोडा क्रोडी दा० दक्षिण में अ० अख्यात ए. ऐसे १० पश्चिम में ए. ऐसे उ० उत्तर में
दुवालसम सयरस छट्ठो उदंसो सम्मत्ता ॥ १२ ॥ ६ ॥ * तेणं कालेणं तेणं समएणं जाव एवं वयासी के महालएणं भंते ! लोए पण्णत्ते ? गोयमा ! महइमहालए लोए पण्णत्ते, पुरच्छिमणं असंखेजाओ जोअण कोडा
कोडीओ दाहिणेणं असंखेजाओ एवं चत्र, एवं पञ्चच्छिमेणवि, एवं उत्तरणवि, एवं राजा चंद्र, सूर्य के कामभोग श्रेष्ठतर कई हैं. अहो गौतम ! ज्योतिषी के इन्द्र चंद्र, सूर्य ऐसे कामभोग भागते हुवे विचरते हैं. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं यों कहकर भगवान् गौतम श्रमण भगवंत , महावीर को वंदना नमस्कारकर यावत् विचरने लगे. यह बारहवा शतक का छठा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥१२॥६॥ है अनंतर उदृशे में चंद्रादिक के अतिशय सुख कहे. चंद्रादिक लोक में होने मे लोक के अंश में जीवों के जन्म जरा मरण की वक्तव्यता कहते हैं. उस काल उस समय में भगवान् गौतम स्वामी श्री महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर पूछने लगे कि अहो भगवन् ! लोक कितना बडा कहा है ? अहो ।
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ