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शब्दाथा
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अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी g+
यावत् प० पारवे में १० पनरवा भाग च० चरम समय में चं चंद्र वि० खुला भ० होवे अ. अक्शर्ष स. समय में चं चंद्र र० आच्छादित वि० खुला भ० होवे ॥ ४ ॥ तक तहां जे मोप० पर्वराहु जघन्य छ. उमास में उ० उत्कृष्ट बा. बीयालीस मा० मास चं० चंद्र का अ० अडतालीस सं० वर्ष सू. सूर्य का ॥५॥ से वह के. कैसे भं. भगवन् १०ऐमा वु. कहा जाता है . इंद्रस. शशी चं० चंद्र जो० ज्योतिषीन्द्र जो. ज्योतिषी राजा का पि० मृगांक वि० विमान में कं० मनोहर दे० देव के.
विरत्तेवा भवइ ॥ तामेव सुक्कपक्खस्स उबदंसेमाणे २ चिट्ठइ, तं पढ़माए पढम भागं जाव पण्णरसेसु पण्णरसमं भागं चरम समए चंदे विरत्ते भवइ अवसेसे समए चंदे रत्तेवा विरत्तेवा भबइ ॥४॥ तत्थणं जे से पव्वराहू से जहण्णणं छण्हं मासाणं उक्कासेणं घायालीसाए मामाणं चंदस्स, अडयालीसाए संवच्छराणं मरस्स ॥५॥ से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ चंदे ससी ?
गोयमा ! चंदस्सणं जोइसिंदस्स जोइसिरण्णो मियंके विमाणे, कंता देवा, कंताओ काल अर्थात् पूर्णिमा को चंद्र विरक्त (स्नुला) दीखता है और शेष सब तिथियों में चंद्र आच्छादित व अनाच्छादित रहता है । अब जो पर्व राहू है वह जघन्य छमास उत्कृष्ट बीयालीम मास में चंद्र को आच्छादित करता है और सूर्य को जघन्य छमात उत्कृष्ट ४८ संवत्सर में आच्छादित करता है ।। ५ ॥ अहो भगवन्! चंद्र को शशी क्यों कहा ? अहा गौतम ! ज्योतिषीन्द्र ज्योतिषी का राजा चंद्र को मृगांकवाला
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाग सुखदवसहायजी पालामसादजी*
भावार्थ
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