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शब्दार्थ रा राहु आ० आते ग. जाते वि. विकुर्वणा करते प. परिगरणा करते चं चंद्र लेश्या को आ०
आवरण करता चि० रहे त० तब म मनुष्य क्षेत्र के म. मनुष्य २० कहते हैं रा• राहु चं. चंद्र को ७ ० ग्रहण करता है ज. जब रा. राह आ० आते चं० चंद्र लेश्या आ० आवर्त कर पा० पास से वी.
जावे त० तब म० मनुष्य क्षेत्र के म० मनुष्य व कहते हैं चं० चंद्रने रा. राहु की कु. कुक्षी भि. भेदी ज० जब रा० राहु आ० आते चं० चंद्र लेश्या को आ० आवर्तकर ५० पीछा फोरे त० तब म.
एवं चेव जाव तदाणं उत्तर पचच्छिमेणं चंदे उवदंसेति दाहिण पुरच्छिमेणं राहू ॥ जदाणं राहू आगच्छमाणेवा गच्छमाणेवा विउन्बमाणेवा परियारेमाणेवा चंदलेस्सं आवरे माणे २ पिढ२,
नागालोर मुराति एवं खलु राहू बंद. गिप्हइ ॥ है एवं जदाणं राहू आगच्छमाणेवा ४ चंदलेस्सं आवरेत्ताणं पासेणं वीईवयइ तयाणं
मणुस्सलोए मणुस्सा बदति-एवं खलु चदेणं राहस्स कुच्छी भिणाए ॥ एवं जदाणं । भावाथ करते व परिचारणा करते जब राहू चंद्र की कांति को ढकता है तब मनुष्य लोक में मनुष्यों बोलते हैं कि
राहू चंद्र को ग्रहण करता है. जब राहू जाते, आते, वैक्रेय करते, परिचारणा करते चंद्रकी कान्ति का आव. 5 रण कर पाजु से जाता है तब मनुष्य लोक में मनुष्य कहते हैं कि चंद्र राहू की कुक्षि में गया. ऐसे ही
राहू जाते, आते, वैक्रेय करते व परिचारणा करते चंद्र की कान्ति को ढक कर पीछा जाता है तब मनु
पंचमांग विवाहपष्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 88
१०४.१ बारहवा शतकका छठा उद्देशा
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