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शब्दार्थ |
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पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) सूत्र 48
रा० राजगृह में जा. यावत् ए. ऐसा व० बोले ब० बहुत ज० मनुष्य भं० भगवन् अ. अन्योन्य ए.. ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् ए० ऐसा प० प्ररूपते हैं रा राहु चं० चंद्रको गे• ग्रहण करता है से वह क० कैसे एक ऐसे मं० भगवन् गो० गौतम जे० जो व. बहुत मनुष्य अ० अन्योन्य जा. यावत् मि० मिथ्या ते. व ए. ऐमा आ० कहते हैं अ. मैं गो. गोलम एक ऐसा आ० कहना हूँ जा. यावत् प० प्ररूपताहूं रा० राहु दे० देव म० महर्दिक जा. यावत् म. महामुखी व प्रधान व वस्त्रधारी म० माला
रायगिहे जाव एवं वयासी बहजणणं भंते ! अण्णमण्णस्स एव माइक्खड जाव एवं परूवेइ एवं खलु राहू चंदे गेण्हइ एवं २ से कहमेयं भंते ! एवं ? गोयमा ! । जंणसे बहुजणे अण्णमण्णस्स जाव मिच्छं ते एव माहंसु, अहं पुण गोयमा ! एव माइक्खामि जाव परूवेमि-एवं खलु राहू देवे महिड्डीए जाव महेसक्खे वरवत्थधरे पांचवे उद्देशे के अंत में जीव कर्म से गति परिणाम को परिणमता है. उक्त जीवों का कर्म संयोग चंद्र व राहू कोभी होता है इस से आगे उद्देशे में चंद्र व राहू का कथन करते हैं. राजगृही नगरी के गुणशील नामक उद्यान में श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर श्री गौतम स्वामी पूछने लगे कि, अहो भगवन् ! बहुत मनुष्यों परस्पर ऐसा वार्तालाप करते हैं कि गहू चंद्रमा को ग्रहण करता है तो यह कथन किस तरह है ? अहो गौतम ! बहुत मनुष्यों जो ऐसा कहते हैं कि राहू चंद्रमा को ग्रहण करता है।
बारहवा शतक का छठा उद्देशान
भावार्थ
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