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अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
पडुच्च जहा णेरइयाणं, वाणमंतर जोइसिय वेमाणिया जहा णेरइया॥१४॥धम्मत्थिकाए जाव पोग्गलत्थिकाए एए सव्वे अवण्णा जाव अफासा णवरं पोग्गलत्थिकाए पंचवण्णे दुगंधे पंचरसे अट्ठफासे पण्णत्ते ॥१५॥ णाणावरणिजे जाव अंतराइए एयाणि जाव चउफासाणि ॥१६॥ कण्ह लेस्साणं भंते ! कइवण्णा पुच्छा ? गोयमा ! दव्वलेस्सं पडुच्च पंचवण्णा जाव अटफासा पण्णत्ता, भावलेस्सं पडुच्च अवण्णा एवं जाव सुक्कलेस्सा ॥ १७ ॥ सम्मट्ठिी ३, चक्खुदंसणे ४, आभिणिबोहियणाणे, ५ जाव विभंगणाणे,
आहारसण्णा जाव परिग्गहसण्णा एयाणि अवण्णाणि४,॥१८॥ओरालियसरीरे जाव तेयग का नारकी जैसे कहना ॥ १४ ॥ धर्मास्तिकाय, अधर्षास्तिकाय, आकाशास्तिकाय काल व जीव इन में वर्णादि नहीं है और पुद्गलास्तिकाय में पांच वर्ण, दो गंध, पांच रस व आठ स्पर्श ऐसे वीस बोल होते हैं, १॥ २५ ।। ज्ञानावरणाय यावत् अंतराय में पांच वर्ण यावत् चार स्पर्श कहे हैं ॥१६॥ कृष्ण लेश्या में, अहो भगवन् ! कितने वर्णादि कहे हुवे हैं ? अहो भगवन् ! द्रव्य लेश्या आश्री पांच वर्ण यावत् आठ स्पर्श कहे हुव हैं भावलेश्या आश्री वर्णादि रहित है. ऐसे ही शुक्ल लेश्या तक जानना ॥ १७ ॥ समदृष्टि, मिथ्याष्टि, व मिश्र दृष्टि, चक्षु दर्शन, अचक्ष दर्शन, अवधि दर्शन व केवल दर्शन, आभिनिवोधिक
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
भावार्थ
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