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सूत्र
भावार्थ
43 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
चक्कसंजोगो जाव असंखेज्ज संजोगो. एए सव्वे जहेर असंखेजाणं भणिया तहेव जाव अणताणाव भाणियव्वं, णवरं एवं अनंतगं अब्भहियं भाणियव्वं जाव अहवा एगयओ संखेज्जा संखेज्ज पएसिया खंधा एगयओ अनंतपए सिए खंधे भवइ, अहवा एगयओ संखेज्जा असंखेज़पएसिया खंधा एगयओ अनंत एसिए खंधे भवइ, अहवा संखेज्जा
एसिया खंधा भवति, असंखेजहा केजमाणे एगयओ असंखेजा परमाणुपोग्गला एमओ अणतपसि खंधे मवई, अहवा एगयओ असंखेजा दुपएसिया खंधा एगयओ अणतपएसिए खंधे भवइ, जाव अहवा एगयओ असंखेजा संखेज्जपएसिया
(शात्मक स्कंध अथवा तीन अनंत प्रदेशात्मक स्कंध चार विभाग करने से तीन परमाणु पुद्गल एक अनंत ( प्रदेशात्मक स्कंध. इसी क्रम से चार पांच यावत् संख्यात संयोग जैसे असंख्यात का कहा वैसे ही कहना विशेष में यहां अनंत बोल कहना. यावत् संख्यात संख्यात प्रदेशात्मक स्कंध, एक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध, अथवा संख्यात असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध एक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध
अथवा संख्यात अनंत
प्रदेशात्मक स्कंध, असंख्यात विभाग करने से असंख्यात परमाणु पुद्गल एक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध, असंख्यात द्विपदेशात्मक स्कंध यावत् असंख्यात संख्यात प्रदेशात्मक स्कंध एक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध असं -}
* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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