________________
सूत्र
भावार्थ
ॐ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र
त्रसंखेज्ज एसिया खंधा भवंति, अहवा दससंखेज्ज पएसिया खंधा भवंति | संखेज्जहा कज्जमाणे संखेजा परमाणुपोग्गला भवति ॥ १० ॥ असंखेज्जहाणं भंते ! परमाणुपोग्गला एगयओ साहणंति, एगयओ साहणित्ता किं भवंति ? गोयमा ! असंखेज्जपएसिए खंधे भवइ, से भिज्जमाणे दुहावि जाव दसहावि, संखेज्जहावि असंखेज्जहात्रि कज्जइ, दुहा कज्जमाणे एगयओ परमाणुपोग्गले एगयओ असंखेज्जपएसिए खंधे भवइ एवं जाव अहवा एगयओ दसपएसिए खंधे भवइ, एगयओ असंखेज्जपएसिए खंधे भवइ, अहवा एगयओ संखेज्जपएसिए खंधे, एगयओ असंखेज्ज
संख्यात परमाणु पुद्गल जानना ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! असंख्यात पुद्गल एकत्रित होने से क्या होता है ? अहो गौतम ! असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध होता है. उस का विभाग करने से दो तीन यावत् दश संख्यात असंख्यात विभाग होते हैं. अब दो विभाग करने से एक परमाणु पुद्गल एक असंख्यात प्रदेशालक स्कंध, एक द्विपदेशात्मक स्कंध एक असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध ऐसे ही एक दश प्रदेशात्मक स्कंध {एक असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध, एक संख्यात प्रदेश/त्मक स्कंध एक असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध अथवा दो असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध. तीन टुकडे करने से दो परमाणु पुद्गल एक असंख्यात प्रदेशात्मक स्कंध अथवा
43- बारहवा शतक का चौथा उद्देशा 4
१७११