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शब्दार्थ।
सूत्र
भावा
१५ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
ठि० स्थिति स्थान प० प्ररूपे ज० जघन्य ठि० स्थिति वाले जा० यात्रतू व उसयोग्य उ० उत्कृष्ट टि० स्थिति अ० अनंख्यात भं० भगवन् पुः पृथ्वी कायावास स० शत सहस्र में ए० एकेक पु० पृथ्वी काय {वास में ज०जयन्य ठि० स्थिति में व वर्तमान में पुत्र पृथ्वी काया किं० क्या को० क्रोधयुक्त मा० मानयुक्त मा० मायायुक्त लो० लोभयुक्त गो० गौतम को० क्रोधयुक्त मा० मा युक्त मा० मायायुक्त लो० लोभयुक्त
पुढविकाइयाणं केवइयाठिइडाणा पण्णत्ता ? गोयमा ! असं खेज्जाठिइट्ठाणा १० | तं. जहाणियाठिई जाव तप्पाउग्गुक्कासियाठिई || असंखेजेसुणं भंते ? पुढविकाइयावास सय सहस्सेसु एगमेगंसि पुढविकाइयावासंसि जहण्णाट्ठईए वट्टमाणा पुढविकाइया किं कोहोवउत्ता, माणोवउत्ता, मायोवउत्ता, लोभोवउत्ता ? गोयमा ! कोहोवउत्तावि, माणोवउत्तावि, मायोवउत्तावि, लोहोवउत्तावि एवं पुढविकाइयाणं { स्थिति स्थानक समयाधिक कहने से असंख्यणते होते हैं. अहो भगवन् ! एक २ स्थान में रहनेवाले पृथ्वी कायिक जीवों कोधवन्त ज्यादा है, मानवन्त ज्यादा है, मायावन्त, या लोभवाले ज्यादा हैं ? अहो गौतम ! क्रोधी भी बहुत है, मानी भी बहुत है. मायावी भी बहुत हैं व लोभी भी बहुत हैं. इस कारन से पृथ्वी { कायिक जीवों में भांग नहीं हैं. एक २ कषायवाले बहुत जीव पृथ्वी काया में रहे हुवे हैं इसलिये दशों द्वार आश्रित अभंग जानन्न. मात्र तेजोलेश्या संबंधी अस्सी भांगे जानना. पृथ्वीकाय में लेश्याद्वार
40354 पहिला शतक का पांचवा उद्देशा
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