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शब्दार्थ
स• श्रमणोपासिका को ए• ऐमा व बोला क० कहां दे देवानुप्रिये सं० शंख स० श्रमणोपासक त० तब सा• वह उ° उत्पला स• श्रमणोपासिका पो० पुष्कली स० श्रमणोपामक को एक ऐसा व० बोली दे० देवानुप्रिय सं० शंख स० श्रमणोपासक पो० पौषधशाला में पो० पौषध सहित ब. ब्रह्मचारी जा जावत वि० रहे है॥ १५ ॥ तक तब से वह पो० पुष्कली म० श्रमणोपासक जे. जहां पो० पौषध शाला जे. जहां सं० शंखम० श्रमणोपासक ते. तहां उ० आकर ग. गमनागमन का ५० प्रतिक्रमण
4. अनुवादक-चालब्रह्मवारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
वयासी कहिणं देवाणुप्पिया ! संखे समणोवासए. ? तएणं सा उप्पला समणोवासिया पोक्खलिं ममणोवासयं एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया ! संखे समणोवासए पोसह सालाए पोसहिए बंभचारी जाब विहरइ ॥ १५ ॥ तएणं
से पोक्खली समणोवासए जेणेव पासहसालाए जणेव संखे समणांवासए तेणेव श्रमप्योपासिका को पूछा कि अहो देवानुप्रिये ! शंख श्रमणोपासक कहां है ? उत्पला श्रमणोपासिका पोखली श्रमणोपासक को बोली कि अहो देवानुप्रिय ! शंख श्रमणोपासक पौषधशाला में ब्रह्मचर्य सहित यावत् पौषध करते हुवे विचरते हैं ॥ १५ ॥ फीर पोखली श्रमणोपासक पौषधशाला में शंख श्रमणोपासक की पास गया. वहां जाकर गमनागमन का प्रतिक्रमण किया और शंख श्रमणोपासक को वंदना नमस्कार
प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदव सहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ