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________________ शार्थ किया १६६२ 2 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी किया सं० शंख श्रमणोपासक णो नहीं ह० शीघ्र आ• आया तं० इसलिये से श्रेय दे० देवानुप्रिय अ० हमको सं० शंख स० श्रमणोपासा को स० बोलाने को ॥ १२ ॥ त०फीर पो० पुष्कली स० श्रमणोपासक ते. उन स० श्रमणोपासकों को एक ऐसा २० बोला अ. बैठो तु. तुम दे० देवानुप्रिय सु०समाधि से वा० विश्राम से अ० मैं सं० शंख स० श्रमणोपास को स० बोलाताहूं ए. ऐसा क. करकेत ते. उन स० श्रमणोपासकों की अं० पास से प० नीकलकर सा. श्रावस्ती ण. नगरी के म. मध्यबीच में जे. जहां सं० शंख स० श्रमणोपासक का गि० गृह त० वहां उ० आकर सं० शंख स. श्रमणोपासक __ असण पाणखाइमसाइमे उवक्खडाविए, तं संखे समणोवासए जो हव्वमागच्छइ, तं सेयं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हं संखं समाणोवासगं सद्दावेत्तए ॥ १२॥ तएणं से पोक्खली समणोवासए ते समणोवासए एवं वयासा अत्थहणं तुब्भे देवाणुप्पिया! , सुनिच्छुया वीसत्था अहंणं संखं समणोवासगं सहामित्ति कट्ट, तेसिं समणोवासगाणं अंतियाओ पडिणिक्खमइ २ त्ता सावत्थीं णयरी मझं मज्झेणं जेणेव संखस्स है समणोवासगस्स गिहे तेणेव उवागच्छइ २ त्ता, संखस्स समणोवासगस्त गिहं अणुप्पउन को बौलाना चाहिये ॥ १२ ॥ उस समय में पुष्कली श्रमणोपासक बोला कि अहो देवानप्रिय ! तुमन शति से बैठो; मैं शंख श्रमणोपासक को बोलाने के लिये जाता हूं. ऐसा कहकर वह श्रमणोपासक की * प्रकाशक-राजाबहादूर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ** भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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