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शब्दार्थ
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+ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगदत ) मूत्र
उ. उच्चार पा० प्रस्रवण भू० भूमि को ५० देखकर द० दर्भ सं० संथारा सं० संथरकर दु० बैठकर पो०१ । पौषध शाला में पो० पौषध सहित बं० ब्रह्मचर्य जा. यावत् प० पाक्षिक पो• पौषध प० पालते वि. विचरने लगा ॥११॥ त फीर ते० वे स० श्रमणोपासक जे. जहां सा० श्रावस्ती न० नगरी जे. जहां सा० अपने २ गि गृह ते वहां उ० आकर वि. विपुल अ० अशन ४ उ तैयार किया अ० परस्पर स० बोलाये ए. एसे २० बोले ए० एसे दे० देवानुप्रिय अ० हमने वि० बहुत अ० अशन ४ उ• तैयार
उच्चार पासवण भूमीओ पडिलेहेइ २ त्ता, दब्भसंथारगं संथरइ २ त्ता, दन्भसंथारगं दुरूहइ २ त्ता, पोसह सालाए पोसहिए बंभचारीओ जाव पक्खियं पोसहं पडि जागरमाणे विहरइ ॥ ११ ॥ तएणं ते समणोवासगा जेणेव साइं साइं गिहाईतेणेव उवागच्छंति २ त्ता विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं उबक्खडाति २ त्ता
अण्णमण्णं सदावेति २ त्ता एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हेहिं से विउले उच्चार प्रस्रवण भूमिदेख कर, दर्भ संथारा संथरकर, दर्भ संथारे पर बैठकर, पौषधशाला में पौषध सहित । ब्रह्मचर्य युक्त यावत् पाक्षिक पौषध करते हुवे विचरने लगा ॥ ११ ॥ अब अन्य श्रमणोपासक भी श्रावस्ती
अपन २ गह आये और विपल अशन, पान, खादिम व स्वादिम बनाकर परस्पर ऐसा बोलने लगे । कि अहो देवानुप्रिय ! अपनने अशनादि तैयार किये हैं, परंतु शंख श्रयणोपासक आये नहीं है। इस से
- बारहवा शतक का पहिला उद्देशा 4380
भावार्थ