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शब्दार्थ आकर ति त्रिदंड के कुंडिका जा. यावत् धा० धारनकर ग० ग्रहणकर जे० जहां आ० आलंभिका
न० नगरी जे. जहां प० परिव्राजक आ० आवास ते. तहां उ० आया भं० भंड णि प्रक्षेप क० करके आ० आलंभिका न० नगरी के सिं० शृंगाटक जा. यावत् प० मार्ग में अ० परस्पर एक ऐसा आ० कहा जा. यावत् प० प्ररूपा शेष पूर्ववत् ॥ १६ ॥ त० तब आ० आलंभिका ण नगरी में ए० ऐसे ए• इस
॥ १५ ॥ एवं संपेहेइ २ ता, आयावणभूमीओ पच्चोरुभइ २ त्ता, तिदंडकुंडिया जाव धाउरत्ताउय गण्हंति २ ता, जेणेव आलंभिया णयरी जेणेव परिवायगावसहे तेणेव उवागए भंडगाणक्खेवं करेइ २ त्ता
आलंभियाए णयरीए सिंगाडग जाव पहेस अण्णमण्णस्स एवमाइक्खइ जाव परूवेइ ___ अत्थिणं देवाणुप्पिया! मम अतिससे णाणदंसणे समुप्पण्णो देवलोएसुणं देवाणं जहण्णे
___णं दसवाससहस्स तहेव जाव वोच्छिण्णा देवाय देवलोगाय ॥ १६ ॥ तएणं भावार्थविचार करके आतापना भूमि में से पीछा आकर त्रिदंड कुंडिका यावत् धारन कर आलंभिका नगरी में
परिव्राजक के आवास में आया. वहां भंडोपकरण रखकर आलंभिका नगरी के शृंगाटक यावत् घडे रस्ते में * ऐसा कहने यावत् प्ररूपने लगा कि अहो देवानुप्रिय ! मुझे अतिशय ज्ञान दर्शन उत्पन्न हुवा है. जिम मे मैं
जान सकता हूं कि देवलोक में देवताओं की जघन्य दश हजार वर्ष उत्कृष्ट दश सागरोपम की स्थिति है
( भगवती ) सूत्र <०१४० 48-808 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति
अग्यारवा शतक का बारहवा उद्देशा
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